सिस्टम बेईमान, बिन घूंस नहीं काम, सत्ता डूबी ऐस में, नोटिस कटती सरकारी,सत्ता से धधकते सवाल

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मध्यप्रदेश की राजनीति।बेहतर दिनों की काल्पनिक तस्वीरें पेश कर सत्ता हथिया ली जाती है। और फिर उसी सत्ता के मद में चूर हो जाने से जनता आंखों से ओझल हो जाती है। तथा जनता की सुधि ना लेने के कारण जो आह रूपी तीर निकलते हैं, उसके असर बहुत भयावह होते हैं। नतीजतन एक के बाद एक कर्ज के चलते प्रदेश आर्थिक दलदल में धंसता जा रहा है, जबकि दूसरी ओर सांसदों–विधायकों, और अफसरों के वेतन भत्ते और सुविधाएं लगातार उछलती जा रही हैं।

 

आम जनता का सीधा आरोप और सवाल है कि आज हर सरकारी काम घूस के बिना संभव क्यों नहीं? सिस्टम क्यों है बेईमान ? हर जगह “पहले पैसा, फिर काम” की नीति चल रही है। सिस्टम सुधारने के बजाय भ्रष्टाचार को ही इनाम दिया जा रहा है।बिजली बिल बढ़ा तो नोटिस, न भर पाए तो दिखाया जाता है कार्यवाही और जेल का डर। गरीब परिवारों के बिजली बिल में मामूली बढ़ोतरी भी, हो रही है जानलेवा साबित। सवाल तो यह भी है कि जब रोज़गार नहीं, आमदनी नहीं—तो जनता भुगतान कहां से करे?

 

ग्रामीण विकास में सरकार के कैसे दावे, हकीकत यह है कि गांवों में सड़कें बदहाल हैं, अतिक्रमण का रोग है, पेंशन से लेकर बिजली पानी कनेक्शन तक में चढ़ोत्तरी का काला साया है, गजब की बात तो यह है कि जायज जमीन नामांतरण में बिना न्योक्षावार के संबंधित कर्मचारीयों के कान पर जूं ही नहीं रेंगती है। गरीब,मजदूरों को काम नहीं, ग्राम पंचायतों में मशीनों का ही राज है।

 

किसानों की फसल तबाह, मुआवज़ा लापता,बारिश, ओलावृष्टि और प्राकृतिक आपदाओं से किसानों की फसलें लगभग हर साल बर्बाद हो जाती हैं, लेकिन मुआवज़ा सिर्फ जले पर नमक छिड़कने के अलावा कागजों में सिमट कर रह जाता है। जबकि यह सब सरकार को सत प्रतिशत पता है।

 

जब सत्ता वर्ग का मन होता है तब विदेश यात्राएं होती हैं, वेतन–भत्ते बढ़ते हैं, सुविधाओं की भरमार होती है,और जनता हालात को समझने में ही त्याग करते हुए अपना दम तोड़ती रहती है।

 

अब सवाल साफ है जनता का, जवाब सरकार दे-क्या हमेशा गरीब का गला दबा कर सत्ता की तिजोरी भरी जाएगी?क्या मजदूर, किसान और गरीब सिर्फ वोट बैंक हैं?प्रदेश जनता के लिए है या सिर्फ सत्ता, के लिए?

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