लोकतंत्र, को रोना और पत्रकारिता..

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शहडोल:-&-क्योंकि जब देश भक्ति का और समाज सेवा का नशा करने का शौक हमें लगा तो हमने पत्रकारिता को चुना था……

&- क्योंकि भारत के संविधान की पांचवी अनुसूची में शामिल विशेष आदिवासी क्षेत्र के हम निवासी हैं…….

&- क्योंकि पत्रकारिता से जुड़े तमाम वेतन आयोग और उससे लाभान्वित व्यक्तियों में जमीनी पत्रकार लगभग अछूता है…….

&- क्योंकि हम भी आदिवासी क्षेत्रों में पड़ रही खुलेआम डकैती और लूट में शामिल नहीं हो पाए….

&- क्योंकि अब हम आदतन पत्रकारिता के पेशे में फंस गए हैं….

जैसे भारत इस समय को रोना में फंसा दिया गया है …और इसलिए जरूरी है कि हम बात अपनी पहुंचाएं जरूर, इस आशा के साथ अगर मानवीय संवेदना लोकशाही में सचमुच कहीं बची है….?, तो वह जमीनी पत्रकारों के लिए “डायरेक्ट बेनिफिट स्कीम” का उपयोग कर कॉर्पोरेट जगत का मीडिया और अखबार मालिकों, नेताओं और अफसरों के भ्रष्टाचार में खत्म होने वाले शासकीय धन (विज्ञापन आदि में मैं कटौती कर) से हमें यानी महामारी के दौर में “जमीनी पत्रकारों” को या 21 दिन के इस महायुद्ध में जिसकी तुलना हमारे प्रधानमंत्री जी “महाभारत युद्ध” से कर रहे हैं… वह कड़वा सच है, किंतु इससे भी ज्यादा कड़वा सच यह है कि आपके मीडिया / पत्रकारिता के “जमीनी सैनिक” विशेषकर असंगठित क्षेत्र के अथवा शासकीय दस्तावेजों में नाम मात्र के दर्ज पत्रकारों को तत्काल राहत दिया जाए…..

बावजूद आशा कम है…. कि ऐसा होगा….? किंतु शायर की यह बात भी अपनी जगह ठीक है की… “आशा पर आकाश टिका है.., कि स्वाॅस-तंतु कब टूटे…..

(त्रिलोकीनाथ)

ग्राम स्वराज महात्मा गांधी की दूरदर्शी कल्पना थी देश की गुलामी के बाद अगर ग्राम स्वराज स्थापित होता… राजनीति पवित्र मंसा की होती तो शायद स्वरूप कुछ और होता।

मेरे देश का प्रधानमंत्री यह निर्णय ले की “जनता कर्फ्यू” लगाएं प्रदेश का मुख्यमंत्री इस बात में इस महामारी के दौरान यह निर्णय ले कि लोकतंत्र, प्रदेश का बचाना है क्योंकि “कोरोना का हमला” है…… इस मद्देनजर विधानसभा स्थगित की जाती है इससे ज्यादा यह कि लगातार कोरोना हमले पर हमला करता चला जा रहा था न सिर्फ केंद्र सत्ता बल्कि राज्य सत्ता और एक कदम आगे चलें तो तथाकथित स्वतंत्र न्यायपालिका में बैठे न्यायाधीश भी कोरोना के खतरे को लेकर आम नागरिक के भरोसे वाला निर्णय लेती, बजाय इसके सत्ता परिवर्तन की “भूख की तृप्ति” के लिए राजतंत्र में भाटो की तरह कोई “बृंद-गान” करती दिखी……

अगर मध्य प्रदेश को मॉडल मान कर इस दुनिया में फैली

कोरोना”कोविड-19″महामारी को मद्देनजर तो बड़ी साफ और स्पष्ट अध्कचरी संस्कृति के मद्देनजर बोलें तो ट्रांस्प्रेंट-महामारी का हमला 23 जनवरी को हो चुका था। हमारी लोकशाही में बैठे तीन प्रमुख स्तंभ न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका; घोड़ा बेच कर सो रहे थे।

जब से हमारे प्रधानमंत्री जी नरेंद्र मोदी सत्ता पर आए अपने नवाचार के तहत उन्होंने विदेश मंत्री के तरह जैसा कि उनकी आदत है अघोषित निर्णय के तहत पूरे विदेशों में घूमने का और दुनिया को देखने का काम किया। 5 साल बल्कि 6 साल वे दुनिया घूमते रहे……

कोरोना बीमारी के जनक चीन के राष्ट्रपति को अपने गृह राज्य अहमदाबाद में लाकर झूला भी झुलाया….. 6 साल में क्या यह उपलब्धि नहीं होनी चाहिए थी कि अगर रूस बच सकता है इस महामारी से लड़ने के लिए, तो भारत को भी बचने का पूरा हक है…. या फिर चीन प्रधानमंत्री के साथ “हिंदी-चीनी भाई-भाई” का नारा लगाते हुए विश्वासघात कर रहा था….? हम उनके उत्पाद और सामग्री को भारत में बाजार दे रहे थे, उनका बैंक खोल रहे थे और वे पीठ में छुरा मार रहे थे….. क्या वे तकनीकी ज्ञान प्राथमिकता से हमें नहीं दे सकते थे….?

यह हमें सोचने का एक वक्त है के जब महामारी फैली है, जब सब रास्ते बंद होते जा रहे हैं, तब लोकतंत्र के तीनों स्तंभ से ज्यादा प्राय: अज्ञात “चतुर्थ-स्तंभ” यानी पत्रकारिता के बारे में प्रधानमंत्री और उनकी अद्यतन लोकशाही इस बात में नवाचार करने के पक्ष में निर्णय ले रही है कि मीडिया को, पत्रकारिता को संपूर्ण स्वतंत्रता देनी चाहिए….. पत्रकारिता को जीवन दीजिए, उसके गलत पक्ष (नेगेटिविटी) का नजरअंदाज करिए किंतु उसमें निकल रहे अच्छे पक्ष को (पॉजिटिविटी) से इस बात की संभावना देखिए कि क्या इस महामारी में लड़ने के लिए इन सैनिकों( जमीनी पत्रकारों) ने क्या अच्छी प्रस्तुति दी है……।

बीते 7 दशक में पत्रकारिता को “यूज एंड थ्रो” और बाद में “कॉर्पोरेट का गुलाम” बनाने वाली सोच का यह एक बड़ा पराजय है….. उसने सत्य स्वीकारने की साहस की है…. किंतु अभी भी वह यानी सत्ताधीश असत्य में जीना चाहता है….? वह चाहता है कि 18 दिन के महाभारत के युद्ध के बाद अब 21 दिन के इस महामारी युद्ध में “पत्रकार-सैनिक” अपने लोक-ज्ञान के जरिए यदि कोई संभावित संजीवनी वटी जंगल से ढूंढ कर ला रहे हैं तो उसका जरूर लोकहित में उपयोग किया जाए….., राम और रावण के युद्ध में यह तय हुआ था कि विद्वान सुषेण वैद्य रक्ष संस्कृति का था, इसके बाद भी उसके ज्ञान का उपयोग राम ने अपने भाई लक्ष्मण को बचाने के लिए वैद्द का अपहरण कराया था। उस समय राजतंत्र था, रामायण की कथा एक बड़ा संदेश है…।

अब लोकतंत्र है महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज की कल्पना की थी किंतु भ्रष्टाचारियों ने उसमें “बाजार” नहीं पाया और उस अवधारणा को धोखा देने का काम किया…. आज भी गांधी का नकाब बाजार पैदा कर रहा है बहरहाल सत्ताधीशों की यह कार्य प्रणाली “प्रकृति-सत्ता” को शायद यह मंजूर नहीं था इसलिए भी 23 जनवरी को संपूर्ण संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद, वैश्विक शक्ति के रूप में उभरने के बाद भी…. भारत सरकार और उसमें दिखने वाले नेता, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शक्तिमान की तरह प्रस्तुत जरूर किए गए, किंतु दुनिया से दुनियादारी सीखने में शायद बहुत देर हो गई………? क्योंकि कांग्रेस मुक्त भारत के कल्पना कार मध्यप्रदेश में कांग्रेस को नष्ट करने का प्रयास रहे थे बावजूद कांग्रेस के नेता राहुल गांधी या प्रियंका गांधी जिन्हें वे वंशवाद बताने में जरा भी नहीं जी सकते यह चिल्लाते रहे की कोरोना एक गंभीर समस्या है कांग्रेस की सत्ता को हटाने से अगर वक्त मिल रहा है तो उस पर भी काम करें आर्थिक मोर्चे पर बहुत गंभीर हालात खड़े होने वाले हैं आदि-आदि जितना उनका इनपुट उन्हें बता रहा था वे प्रवक्ता की तरह बोल रहे थे यह अलग बात है कि भोपू पत्रकारिता ने उसे कितना तवज्जो दिया या उनकी बात को दबा दिया फिर भी छनकर बातें आ ही रही थी।

यही कारण है कि 23 जनवरी को जब हमारा पड़ोसी चीन “तथाकथित तौर पर इस जैविक हथियार” का प्रयोग कर रहा था तब हम नींद में थे….. अहमदाबाद में झूला झूलाना पाकिस्तान को बिरयानी खिलाने से ज्यादा कुछ भी नहीं रहा…..? यह इसलिए भी आरोप लग रहा है क्योंकि केरल में आने वाले पहले 3 संक्रमित कोरोना के व्यक्तियों को आने के बाद पूरे विदेशियों पर कड़ी नजर कड़े प्रतिबंध और कड़ा पहरा नहीं लगा कर रखा गया……?

धन्यवाद की पात्र है वह और अच्छा है कनिका कपूर, लोकतंत्र के इन महाराजाओं के बीच में घूम-घूम कर नाची…. कॉर्पोरेट सिस्टम में करुणा की जागरूकता उसी प्रकार से पैदा की जैसा कि हमारे पांचवी अनुसूची क्षेत्र में कभी बैगा सम्मेलन पर तब मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान वैभव के साथ जमकर नाचे थे….,

बहरहाल शायद तब हमारा लोकशाही जागा जब पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व महारानी वसुंधरा राजे, आइसोलेशन में चली गई….. पूरे देश में यह चर्चा का विषय बन गया इसलिए भी कि अभी हाल में मध्य प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के केंद्र पर महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में प्रवेश किए थे जोकि पूर्व महारानी वसुंधरा राजे के भाई ग्वालियर महाराजा के पुत्र हैं इस प्रकार वे उनके भतीजे लगे इनके साथ कुछ लोकतंत्र के और वाहक भी जब अन्य नेता कोरोना की गिरफ्त में आने का भय जीने लगे…. तब तक बहुत देर हो चुकी थी……. और कोरोना के सभी वाहक चीनी बाजार की तरह भारत के आम नागरिकों के बीच में फैलने का काम कर गए और खेल रहे थे।

हम मध्य प्रदेश की बात करें यहां दिल्ली के “टेस्ट-ट्यूब” के जरिए काल्पनिक डॉक्टर अमित शाह के लोकतंत्र की प्रसव पीड़ा में नकली प्रयोग हो रहे थे..?,

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