महा-संग्राम: पुतलों की राख में दफन हुए किसान के मुद्दे? पांढुरना-सौसर के सियासी रण में ‘अन्नदाता’ सिर्फ एक चुनावी मोहरा!

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पांढुरना संवाददाता- निलेश कलस्कर जिला ब्युरो चिफ

 

पांढुरना/सौसर। क्षेत्र में इन दिनों राजनीति का ऐसा उबाल आया है जिसने आम जनमानस को झकझोर कर रख दिया है। पांढुरना से लेकर सौसर तक सड़कों पर सिर्फ झंडे, नारेबाजी और रैलियों का रेला दिखाई दे रहा है। लेकिन इस ‘महा-संग्राम’ की परतें उधेड़ी जाएं तो एक कड़वा सच सामने आता है—सत्ता और विपक्ष की इस जंग में किसान की सिसकियाँ दब कर रह गई हैं।

भाषणों की जंग और बदले की राजनीति

शुरुआत पांढुरना से हुई, जहाँ कांग्रेस ने किसानों के हित का झंडा बुलंद करते हुए प्रदर्शन किया। लेकिन कुछ ही दिनों में सौसर की सड़कों पर भाजपा ने पलटवार कर दिया। कांग्रेस विधायक के बयानों को ढाल बनाकर ‘जन आक्रोश’ का ऐसा शोर मचाया गया कि मुख्य मुद्दे ही गायब हो गए। एक तरफ ‘किसान हित’ का दावा था, तो दूसरी तरफ ‘मर्यादा और कार्रवाई’ की मांग। दोनों तरफ से पुतले धू-धू कर जले, लेकिन क्या उस आग में किसान की बदहाली की समस्या सुलझी?

सनसनीखेज सवाल: दांव पर किसान, फायदे में नेता?

क्षेत्र में चर्चाओं का बाजार गर्म है कि यह रैलियां किसानों के लिए थीं या अपनी सियासी जमीन मजबूत करने के लिए?

फसल का दाम: आज भी मंडियों में किसान अपनी फसल के सही दाम के लिए तरस रहा है।

कर्ज का फंदा: बैंक के नोटिस और बढ़ते ब्याज के बोझ तले दबे किसान को रैलियों से क्या मिला?

सिर्फ ज्ञापन का खेल: भारी भीड़ और पुलिस बल के बीच सौंपे गए ज्ञापनों पर अब तक कितनी धूल जमी है, इसका हिसाब कोई नहीं दे रहा।

जनता की अदालत में सवाल

पूरे क्षेत्र में इस बात को लेकर खलबली है कि अगर दोनों दल वाकई किसानों के प्रति गंभीर होते, तो आज सड़कों पर एक-दूसरे को नीचा दिखाने के बजाय ‘साझा मंच’ पर किसानों की समस्याओं का समाधान खोजा जा रहा होता। यह रैलियां महज एक शक्ति प्रदर्शन बनकर रह गई हैं, जिसने जनता को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या उनका वोट सिर्फ पुतले जलाने और रैलियां निकालने के लिए है?

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