हुकूमत की नाकामी का ऐलान: तरक़्क़ी के नाम पर सिर्फ़ तख़्ती बदली, गांव की रूह आज भी प्यासी है : कमलेश्वर पटेल

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प्राइड इंडिया न्यूज़ सीधी, रिपोर्ट : शाहिद खान

 

भोपाल से उठती एक सियासी गूंज में पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल ने सरकार की कार्यशैली पर तीखा सवाल दागा।

उन्होंने याद दिलाया कि जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और श्री कमलनाथ मुख्यमंत्री थे, तब पंचायती राज और ग्रामीण विकास विभाग के माध्यम से गांवों की रीढ़ मजबूत करने का ईमानदार प्रयास हुआ। महज़ एक वर्ष में प्रदेश भर में एक हज़ार गौशालाओं की नींव रखी गई, मनरेगा के तहत 40 से 42 लाख रुपये की लागत से पंचायतों ने अपने हाथों से विकास गढ़ा। यह सिर्फ ईंट-सीमेंट का ढांचा नहीं था, बल्कि गांवों में रोज़गार, पशुधन संरक्षण और पंचायतों की आर्थिक आत्मनिर्भरता का संकल्प था—एक ऐसी सोच जिसमें गांव केंद्र में था, सत्ता नहीं।

 

इसी विचारधारा से जन्म हुआ महात्मा गांधी ग्राम सेवा केंद्र का,

जहां ग्रामीणों को योजनाओं के लिए दफ्तर-दर-दफ्तर भटकना न पड़े, बल्कि एक ही छत के नीचे सेवा, सुविधा और सम्मान मिले। कमलेश्वर पटेल के शब्दों में यह “गांव के लोकतंत्र को मज़बूत करने की कोशिश” थी। लेकिन अफ़सोस, भाजपा सरकार ने इस सोच की रूह को समझने के बजाय उसकी पहचान से ही छेड़छाड़ कर दी। नाम बदलकर अटल ई-सेवा केंद्र कर देना विकास नहीं, बल्कि विज़न की तंगी का सबूत है—जहां नीति की जगह नेमप्लेट और सेवा की जगह सियासत ने ले ली।

 

पूर्व मंत्री का आरोप सीधा और तल्ख है—भाजपा सरकार ने काम की नहीं, केवल नाम की राजनीति की।

गांव की अर्थव्यवस्था, पंचायत की ताक़त और ग्रामीण रोज़गार जैसे असली मुद्दे हाशिये पर चले गए, जबकि सत्ता ने आत्ममुग्धता में उपलब्धियों पर परदा डाल दिया। कमलेश्वर पटेल ने कहा कि अगर सरकार की नीयत में सचमुच गांव होते, तो योजनाओं की आत्मा को ज़िंदा रखा जाता, न कि इतिहास को मिटाकर श्रेय की तख़्ती टांग दी जाती। यह सिर्फ एक नाम बदलने की कहानी नहीं, बल्कि उस नाकामी का दस्तावेज़ है, जहां शासन ने गांव की ज़रूरतों को समझने के बजाय उन्हें भुला दिया।

 

प्राइड कदम हिंदी समाचार एवं प्राइड इंडिया न्यूज़ सीधी (मध्य प्रदेश)

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