संतुलित जीवन हीं संयम है- डॉ शीतल जैन शास्त्री

पर्युषण पर्व में आत्मा के दस स्वभाव पर कैसे विजय पाया जाए इसी को बताया जाता है। दस दिवसीय जैन पर्युषण पर्व के छठे दिन संयम धर्म की पूजा होती है. आज पटना के मीठापुर, कदमकुआँ, मुरादपुर, कमलदह मंदिर, गुलजार बाग सहित सभी दिगम्बर जैन मंदिरों में संयम धर्म की पूजा की गयी. सभी दिगम्बर जैन मंदिरों में सुबह से हीं पूजा करने हेतु श्रद्धालु मंदिरों में पहुँचने लगे. मंदिरों में श्रद्धालुओं ने भगवान् का अभिषेक किया एवं शांतिधारा के बाद श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, कदमकुआं में संयम धर्म की पूजा भोपाल से पधारे पंडित डॉ शीतल जैन शास्त्री ने श्रद्धालुओं को कराई जिसे सागर से पधारे संगीतकार ने अपने धुनों में पिरोया।
एम पी जैन ने बताया कि आज दिगम्बर जैन समाज द्वारा दसलक्षण पर्व के तहत सुगंध दशमी मनाया गया । इस अवसर पर समाज जनों द्वारा अपने कर्मों के क्षय की भावना को लेकर सभी श्रद्धालुओं द्वारा भगवान के समक्ष धूप चढ़ाया गया। संयम धर्म के सम्बन्ध बताते हुए पंडित डॉ शीतल जैन शास्त्री ने कहा कि संयम के बिना आदमी पशु के सामान है. डॉ शास्त्री ने कहा कि “उपवन की शोभा पौधों से , पौधों की शोभा फूलों से, मंदिर की शोभा भक्तों से तथा जीवन की शोभा संयम” से होती है. डॉ शास्त्री ने बताया कि कितनी भी अच्छी गाड़ी हो अगर ब्रेक नहीं हो तो गाडी बेकार है . इसी प्रकार अगर मनुष्य में संयम नहीं हो तो वह मनुष्य पशु की तरह व्यवहार करने लगता है . मनुष्य को अपने पाँचों इन्द्रियों पर संयम रखना चाहिए. संयम मन के अधीन होता है. जब हम संयम पाल लेंगे तो हमारी आकांक्षाएँ भी सीमित हो जाएगी, और फिर हम अपने मन को और इंद्रियों को भी वश में कर लेंगे। डॉ शीतल शास्त्री ने बताया कि मानव जाति का अस्तित्व संयम के बिना संभव नहीं है। मनुष्य अपनी पाशविक वृतियों के नियंत्रण के द्वारा ही सामाजिक प्राणी बन पाया है। सामाजिक संरचना एवं व्यवस्था तभी कायम रह सकती है जब उसके सदस्य नियमो का पालन करें। नियमो का पालन करना ही सामाजिक संयम है। समाज की प्रत्येक इकाई अपने को संयम की परिधि में बांधकर जीवन व्यतीत करता है तभी समाज में शान्ति व्यवस्था कायम रहती है। जब किसी समाज के सदस्य संयम के बंधनो को तोड़ते है तो समाज के वातावरण में जहर घुल जाता है। क्रोध पर संयम न करने के कारण हमारा जीवन संघर्षों से भर जाता है। काम पर संयम न रखने के कारण हम पशु बन जाते है। संयमहीन आचरण के कारण ही जीवन में अशांति , व्याकुलता , द्वेष ,अमानवीयता , क्रूरता आदि भावों एवं वृत्तियों का संचार होता है। अतः जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संयम अनिवार्य है। उधर मिठापुर दिगम्बर जैन मंदिर में भोपाल।से पधारे बाल ब्रह्मचारी सुमित भैया जी ने श्रद्धालुओं को संयम धर्म के संबंध में विस्तार से बताया।
एम पी जैन ने बताया कि पर्युषण पर्व के सातवें दिन सोमवार को उत्तम तप धर्म की पूजा की जायेगी.
एम पी जैन
सचिव, मीडिया