“खामोश हो गई घोड़ों की टापें: सीधी से गायब होती एक शान, बदलते दौर की कहानी”

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सीधी, मध्यप्रदेश | विशेष रिपोर्ट

कभी सीधी जिले की सड़कों और कच्चे रास्तों पर घोड़ों की टापों की गूंज आम बात हुआ करती थी। सुबह की पहली किरण से लेकर शाम ढलने तक घोड़ों की सरपट दौड़ एक अलग ही पहचान बनाती थी। लेकिन आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं—घोड़ों की वह पहचान, वह रौनक अब कहीं खो सी गई है।

एक समय था जब घोड़ा सिर्फ शौक नहीं, बल्कि शान और जरूरत दोनों हुआ करता था। बारातों की अगुवाई से लेकर ग्रामीण परिवहन तक, हर जगह घोड़ों की मौजूदगी दिखाई देती थी। खासकर युवाओं में घोड़ा पालना प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था।

लेकिन अब सवाल यह है—आखिर कहां गायब हो गई ये टापें?

विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों की मानें तो इसके पीछे कई कारण हैं।

सबसे बड़ा कारण है तेजी से बढ़ता आधुनिकीकरण। बाइक, कार और अन्य वाहनों ने न सिर्फ यात्रा को आसान बनाया, बल्कि घोड़ों की उपयोगिता को लगभग खत्म कर दिया।

दूसरा बड़ा कारण है घोड़े पालने का बढ़ता खर्च और देखभाल की जटिलता। जहां पहले ग्रामीण परिवेश में यह आसान था, वहीं अब शहरों और कस्बों में इसके लिए जगह और संसाधन दोनों की कमी है।

इसके अलावा बदलती जीवनशैली और घटता शौक भी एक अहम वजह है। नई पीढ़ी अब पारंपरिक शौकों से दूर होती जा रही है।

स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि,

“पहले हर गांव में 5-10 घोड़े मिल जाते थे, अब पूरे इलाके में ढूंढने पर भी मुश्किल से नजर आते हैं।”

आज सीधी ही नहीं, बल्कि पूरे मध्यप्रदेश में घोड़ों की टापों की आवाज धीरे-धीरे इतिहास बनती जा रही है।

क्या यह सिर्फ समय का बदलाव है, या हमारी परंपराओं का अंत?

यह सवाल अब भी कायम है।

जरूरत है कि इस परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए प्रयास किए जाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां सिर्फ कहानियों में नहीं, बल्कि असल में भी घोड़ों की टापों की आवाज सुन सकें।

(रिपोर्ट: प्राइड इंडिया न्यूज़, सीधी)

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