ये कैसा न्याय है? इंदौर दूषित पेयजल कांड में कार्रवाई या काग़ज़ी खानापूर्ति

सीधी से ज्ञानेंद्र कुमार अग्निहोत्री ने इंदौर के दूषित पेयजल मामले पर तीखा सवाल उठाते हुए कहा है कि राज्य शासन की तथाकथित “कड़ी कार्रवाई” ज़मीनी हकीकत से कोसों दूर दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि इंदौर में दूषित पेयजल से नागरिकों की सेहत पर गंभीर खतरा पैदा हुआ, लोग बीमार पड़े, लेकिन शासन की कार्रवाई सिर्फ आदेश जारी करने, नाम बदलने और कुर्सियां खिसकाने तक सीमित नजर आती है।
क्या यही कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई है?
सरकारी दावों के मुताबिक लापरवाही के दोषी अधिकारियों पर तत्काल प्रभाव से कार्रवाई की गई, लेकिन वास्तविकता यह है कि
न निलंबन दिखा
न विभागीय जांच की ठोस पहल
न दंडात्मक कार्रवाई
बल्कि अधिकांश मामलों में सिर्फ स्थानांतरण और नई पदस्थापना ही नजर आती है।
ज्ञानेंद्र अग्निहोत्री ने सवाल उठाया—
किस अधिकारी की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी तय हुई?
किस पर दंड लगाया गया?
किसके खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज हुआ?
उन्होंने कहा कि जब दूषित पानी पीने से आमजन का स्वास्थ्य खतरे में पड़ा, तब जवाबदेही तय करने की कसौटी क्या सिर्फ कुर्सी बदलना ही है?
सरकार भले ही कह रही हो कि “नागरिकों के स्वास्थ्य से कोई समझौता नहीं किया जाएगा”, लेकिन कार्रवाई का स्वरूप देखकर साफ लगता है कि समझौता काग़ज़ों में नहीं, ज़मीनी सच्चाई में हो रहा है। जनता आज यही पूछ रही है—
अगर यही न्याय है, तो अन्याय किसे कहते हैं?
इंदौर जैसे बड़े शहर में पेयजल की शुद्धता जीवन-मरण का सवाल है। यहां दोषियों पर कठोर कार्रवाई का अर्थ केवल तबादला नहीं, बल्कि निलंबन, वेतनवृद्धि रोक, विभागीय दंड और कानूनी कार्रवाई होना चाहिए।

निष्कर्ष साफ है:
जब तक लापरवाही के दोषियों को वास्तविक और उदाहरणात्मक सज़ा नहीं मिलेगी, तब तक ऐसे हादसे रुकेंगे नहीं। वरना यह पूरा मामला न्याय नहीं, महज़ दिखावा बनकर रह जाएगा।