17 महीने से फाइलों में अटकी जांच, सात दिन में देनी थी रिपोर्ट

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शहपुरा की तीन पंचायतों में कथित वित्तीय अनियमितता की शिकायत का मामला, जांच के आदेश के बाद भी स्थिति स्पष्ट नहीं

 

(जिला ब्यूरो मनोज कुमार यादव)

 

डिंडौरी/शहपुरा। जनपद पंचायत शहपुरा की तीन ग्राम पंचायतों में शासकीय राशि के कथित दुरुपयोग और निर्माण कार्यों में अनियमितता को लेकर की गई शिकायत पर जांच के आदेश तो तत्काल जारी कर दिए गए, लेकिन जांच का नतीजा अब तक सामने नहीं आया है। हैरानी की बात यह है कि मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने संबंधित अधिकारियों को एक सप्ताह के भीतर बिंदुवार जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे, लेकिन करीब 17 माह बीत जाने के बाद भी जांच की वर्तमान स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है।

 

मामला ग्राम पंचायत ढोंढा-बिलगांव, पिपरिया और मालपुर से जुड़ा है। जनपद पंचायत क्षेत्र क्रमांक-06 की सदस्य शांति धुर्वे ने 25 मार्च 2025 को शिकायत देकर विभिन्न शासकीय मदों से कराए गए कार्यों, भुगतान और राशि के उपयोग की जांच की मांग की थी। शिकायत में लगाए गए आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है, लेकिन जांच रिपोर्ट में हो रही देरी ने अब पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

2 अप्रैल 2025 को जारी हुआ था जांच आदेश

 

दस्तावेजों के अनुसार शिकायत के बाद जनपद पंचायत शहपुरा के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने 2 अप्रैल 2025 को पत्र क्रमांक 42 जारी किया था। इसमें शिकायत के बिंदु क्रमांक 1 से 4 तक की बिंदुवार जांच कर एक सप्ताह के भीतर प्रतिवेदन कार्यालय में प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे।

 

निर्धारित समय-सीमा के अनुसार रिपोर्ट अप्रैल 2025 में ही सामने आ जानी चाहिए थी, लेकिन अब सितंबर 2026 आ चुका है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर जांच रिपोर्ट कहां अटकी है और इस देरी के लिए जवाबदेह कौन है।

 

बिलगांव में नाली निर्माण को लेकर शिकायत

 

शिकायत में ग्राम पंचायत बिलगांव में वर्ष 2022-23 के दौरान 15वें वित्त आयोग की राशि से नाली निर्माण से संबंधित कार्य को लेकर सवाल उठाए गए थे। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि नाली निर्माण के लिए राशि उपलब्ध होने के बावजूद अपेक्षित निर्माण कार्य नहीं कराया गया।

 

इन आरोपों की वास्तविक स्थिति जांच के निष्कर्ष से ही स्पष्ट हो सकेगी।

 

पिपरिया में कई कार्यों पर उठाए सवाल

 

ग्राम पंचायत पिपरिया में वर्ष 2021-22 के दौरान नलजल विस्तारीकरण के लिए मिली राशि के साथ तालाब, शौचालय और ग्रेवल रोड से जुड़े कार्यों को लेकर भी शिकायत की गई थी।

 

शिकायत में आरोप लगाया गया था कि ग्रेवल रोड के निर्धारित कार्य के स्थान पर कथित तौर पर केवल एक परत का काम कराया गया और भुगतान कर दिया गया। मामले में संबंधित कार्यों और भुगतान की जांच की मांग की गई थी।

 

ढोंढा में बॉउंड्रीवाल और मनरेगा कार्यों पर आरोप

 

ग्राम पंचायत ढोंढा में बॉउंड्रीवाल निर्माण से संबंधित कार्य को लेकर भी शिकायत की गई। आरोप लगाया गया कि निर्माण कार्य कराए बिना राशि आहरित की गई।

 

इसके अलावा मनरेगा के तहत वृक्षारोपण, कंटूर ट्रेंच और गली प्लग जैसे कार्यों में सामग्री एवं परिवहन के नाम पर कथित फर्जी बिलों के माध्यम से भुगतान किए जाने की शिकायत भी सामने आई थी।

 

विभिन्न वित्तीय मदों की जांच की मांग

 

शिकायत में 5वें, 14वें और 15वें वित्त आयोग, पंचपरमेश्वर तथा मनरेगा के तहत कराए गए कार्यों और खर्च की गई राशि की जांच की मांग की गई थी। इसके साथ ही मानदेय, किराना सामग्री, कार्यालय व्यय और अन्य मदों में किए गए भुगतान तथा सप्लायरों के नाम पर लगाए गए कथित बिलों की भी जांच कराने की मांग की गई।

 

हालांकि इन आरोपों को अभी प्रमाणित नहीं माना जा सकता। इनके संबंध में वास्तविक स्थिति जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगी।

 

जांच टीम से संपर्क किया तो नहीं मिला स्पष्ट जवाब

 

जांच की वर्तमान स्थिति जानने के लिए जांच टीम के सदस्यों से संपर्क किया गया। लेकिन जांच पूरी हुई या नहीं, प्रतिवेदन तैयार हुआ या नहीं और रिपोर्ट किस स्तर पर लंबित है, इस संबंध में स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी।

 

कुछ जांच सदस्यों ने मामले पर गोलमोल जवाब दिए, जबकि जांच से जुड़े उपयंत्री विकास खरे सहित अन्य संबंधित अधिकारियों से दूरभाष पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन फोन रिसीव नहीं किया गया।

 

ऐसे में जांच रिपोर्ट को लेकर स्थिति और भी अस्पष्ट बनी हुई है।

 

अब सवाल शिकायत से ज्यादा जांच की देरी पर

 

मामले में अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सीईओ ने स्वयं सात दिन के भीतर जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे, तो करीब 17 माह बाद भी रिपोर्ट की स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं है?

 

क्या जांच टीम ने समय-सीमा में रिपोर्ट तैयार कर दी थी? यदि हां, तो रिपोर्ट का निष्कर्ष और उस पर की गई कार्रवाई क्या है? यदि रिपोर्ट तैयार नहीं हुई तो आदेश का पालन क्यों नहीं हुआ? और यदि जांच लंबित है तो इतने लंबे समय से इसे पूरा क्यों नहीं किया गया?

 

रिपोर्ट आएगी तभी आरोपों की हकीकत होगी साफ

 

शिकायत में लगाए गए आरोपों की सत्यता का फैसला जांच निष्कर्ष के आधार पर ही होगा। आरोप सही पाए जाते हैं तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए और यदि आरोप निराधार मिलते हैं तो संबंधित पंचायतों और जिम्मेदारों की स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए।

 

फिलहाल मामला जांच रिपोर्ट के इंतजार में है। सात दिन में मांगी गई रिपोर्ट 17 महीने बाद भी सामने नहीं आना अब सिर्फ जांच में देरी का मामला नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल बन गया है।

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