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अव्यवस्था की भेंट चढ़ी नंबर-1 मंडी: क्या पांढुरना कृषि उपज मंडी को खत्म करने की रची जा रही है साजिश?

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पांढुरना संवाददाता- निलेश कलस्कर जिला ब्युरो चिफ

 

पांढुरना। किसी दौर में प्रदेश की अग्रणी मंडियों में शुमार रहने वाली पांढुरना कृषि उपज मंडी आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। बदहाली का आलम यह है कि जो मंडी कभी किसानों की खुशहाली का द्वार मानी जाती थी, वह आज मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रही है। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि मंडी का तौल कांटा (धर्म कांटा) बीते कई वर्षों से धूल फांक रहा है, जिसे सुचारू करने की सुध लेने वाला कोई नहीं है।

अधिकारियों के दावों पर सवाल

मंडी प्रशासन का तर्क है कि मंडी में उपज की आवक कम हो गई है, इसलिए सुविधाएं विस्तार नहीं पा रही हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। स्थानीय किसानों का आरोप है कि उपज तो पर्याप्त है, लेकिन मंडी में व्याप्त अव्यवस्थाओं के कारण वे यहां आने से कतरा रहे हैं। किसानों के बीच अब यह चर्चा आम है कि क्या यह महज प्रशासनिक विफलता है या फिर मंडी अधिकारियों और चुनिंदा व्यापारियों की मिलीभगत से मंडी को ‘जीरो’ करने की कोई गहरी साजिश?

सुविधाओं का अभाव, किसानों में रोष

मंडी परिसर में सुविधाओं की भयंकर कमी के कारण किसानों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। छाया, पेयजल और सुरक्षा जैसे बुनियादी इंतजाम भी यहां नदारद हैं। धर्म कांटा बंद होने की वजह से किसानों को निजी काटों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे शोषण की आशंका बनी रहती है।

मुख्य बिंदु: एक नजर में

बंद पड़ा धर्म कांटा: वर्षों से बंद पड़े तौल कांटे ने मंडी की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

साजिश की बू: व्यापारियों और अधिकारियों के बीच कथित सांठगांठ की चर्चाएं जोरों पर।

किसान पलायन: सुविधाओं की कमी के चलते किसान अपनी उपज अन्य मंडियों में ले जाने को मजबूर।

संपादकीय टिप्पणी: पांढुरना मंडी का गिरता स्तर न केवल अर्थव्यवस्था के लिए खतरा है, बल्कि हजारों अन्नदाताओं के भरोसे के साथ खिलवाड़ भी है। शासन-प्रशासन को जल्द ही इस दिशा में कड़े कदम उठाने होंगे।

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