स्कूलों में समूह भोजन व्यवस्था पर सवाल, बच्चों को नहीं मिल रहा रुचिकर मेनू के अनुसार खाना

जिलेभर में समूह भोजन व्यवस्था को लेकर रोष, 90 प्रतिशत स्कूलों में अनियमितता के आरोप

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सीधी। जिलेभर के शासकीय स्कूलों में बच्चों को दिए जाने वाले समूह भोजन को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि जिले की करीब 90 प्रतिशत स्कूलों में बच्चों को निर्धारित एवं रुचिकर मेनू के अनुसार भोजन नहीं मिल रहा है। कई जगह भोजन की गुणवत्ता को लेकर भी शिकायतें सामने आ रही हैं।

 

ताजा मामला शासकीय विद्यालय बारपान का सामने आया है, जहां बच्चों के बयानों और मौके की स्थिति ने समूह भोजन व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बच्चों का कहना है कि स्कूल में मिलने वाला भोजन कई बार कच्चा रह जाता है और निर्धारित मेनू के अनुसार भी खाना नहीं मिलता। इसी वजह से इंटरवेल के दौरान कई बच्चे भोजन करने के बजाय अपने घर चले जाते हैं।

 

बच्चे खुद धो रहे थाली, भोजन को लेकर भी शिकायत

 

बच्चों के अनुसार स्कूल में भोजन करने के बाद उन्हें अपनी थाली स्वयं धोनी पड़ती है। वहीं बच्चों ने यह भी बताया कि कई बार खाना पूरी तरह पका हुआ नहीं होता और उन्हें मनपसंद या निर्धारित मेनू के अनुसार भोजन नहीं मिलता।

 

ऐसे में सवाल उठता है कि बच्चों के लिए संचालित समूह भोजन योजना की नियमित निगरानी आखिर किस स्तर पर की जा रही है?

 

समूह और शिक्षकों की कथित मिलीभगत पर भी उठ रहे सवाल

 

जिले के कई स्कूलों में समूह भोजन व्यवस्था को लेकर शिकायतें सामने आने के बावजूद जिम्मेदार शिक्षक अपने वरिष्ठ अधिकारियों को लिखित शिकायत या प्रतिवेदन क्यों नहीं सौंपते?

 

यदि भोजन की गुणवत्ता खराब है, खाना कच्चा मिल रहा है या निर्धारित मेनू का पालन नहीं हो रहा है, तो स्कूल के जिम्मेदार शिक्षक और प्रधानाध्यापक इसकी जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को लिखित रूप में क्यों नहीं देते?

 

यहीं से समूह संचालकों और स्कूल प्रबंधन के बीच कथित मिलीभगत की आशंका को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। हालांकि इसकी वास्तविकता जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है।

 

कक्षा 7 की बच्ची को स्कूल का नाम तक नहीं पता

 

मामले का एक और चिंताजनक पहलू सामने आया है। कक्षा 7 की एक बालिका अपने ही स्कूल का नाम स्पष्ट रूप से नहीं बता पा रही थी। यह स्थिति केवल समूह भोजन व्यवस्था ही नहीं, बल्कि स्कूल में बच्चों की पढ़ाई और शैक्षणिक गतिविधियों की निगरानी पर भी सवाल खड़े करती है।

 

अधिकारियों से निष्पक्ष जांच की मांग

 

अब जरूरत है कि विभागीय अधिकारी केवल कागजी रिपोर्ट के आधार पर व्यवस्था को सही न मानें, बल्कि अचानक स्कूलों का निरीक्षण करें, बच्चों से सीधे बातचीत करें, भोजन की गुणवत्ता और निर्धारित मेनू की जांच करें तथा समूह भोजन की वास्तविक स्थिति का सत्यापन करें।

 

साथ ही यह भी जांच होनी चाहिए कि जिन स्कूलों में भोजन को लेकर शिकायतें हैं, वहां के प्रधानाध्यापक एवं शिक्षक वरिष्ठ अधिकारियों को लिखित प्रतिवेदन क्यों नहीं दे रहे हैं। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या मिलीभगत सामने आती है तो जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जानी चाहिए।

 

सबसे बड़ा सवाल—बच्चों के हिस्से की थाली में यदि व्यवस्था की कमी साफ दिखाई दे रही है, तो जिम्मेदार लोग आवाज उठाने के बजाय चुप क्यों हैं?

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