सौतेले पिता को नाबालिग से दुष्कृत्य के मामले में 20-20 वर्ष का सश्रम कारावास

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इंदौर। इंदौर के बाणगंगा थाना क्षेत्र में 16 वर्ष से कम उम्र की बालिका के साथ दुष्कृत्य करने वाले उसके सौतेले पिता को विशेष न्यायालय ने कड़ी सजा सुनाई है। पंचम अपर सत्र न्यायाधीश एवं विशेष न्यायालय ने आरोपी को पॉक्सो अधिनियम की धाराओं 5/6 और 3/4 के तहत 20-20 वर्ष के सश्रम कारावास से दंडित किया है।

अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 342 के तहत 3 माह के सादा कारावास तथा कुल 21 हजार रुपये के अर्थदंड से भी दंडित किया। शासन की ओर से प्रकरण में विशेष लोक अभियोजक सुश्री सीमा शर्मा ने पैरवी की।

पीड़िता को 4 लाख रुपये प्रतिकर की अनुशंसा

न्यायालय ने पीड़ित प्रतिकर योजना के तहत बालिका को हुई मानसिक क्षति को ध्यान में रखते हुए 4 लाख रुपये की राशि प्रदान किए जाने की अनुशंसा की है।

सौतेले पिता ने घर में दरवाजे बंद कर किया अपराध

अभियोजन के अनुसार 25 मई 2024 को बालिका ने अपनी मां के साथ बाणगंगा थाने पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई थी। बालिका के मुताबिक उसकी मां नौकरी पर गई थी और वह अपने भाई-बहनों के साथ घर पर थी। इसी दौरान उसका सौतेला पिता घर आया और कमरे के दोनों तरफ के दरवाजे बंद कर मोबाइल पर तेज आवाज में गाने चला दिए। इसके बाद आरोपी ने बालिका के साथ जबरदस्ती दुष्कृत्य किया।

घटना के बाद बालिका रोते हुए पड़ोस की महिला के घर पहुंची और पूरी घटना बताई। पड़ोसी महिला ने उसकी मां को फोन कर घटना की जानकारी दी। बालिका ने यह भी बताया कि आरोपी पहले भी उसके साथ छेड़छाड़ कर चुका था।

मामले में बाणगंगा थाने में अपराध क्रमांक 717/2024 के तहत विभिन्न धाराओं और पॉक्सो अधिनियम के प्रावधानों में प्रकरण दर्ज कर विवेचना शुरू की गई। पुलिस ने बालिका के बयान, मेडिकल परीक्षण और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को गिरफ्तार किया तथा विवेचना पूरी होने के बाद अभियोग-पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया।

अभियोजन ने न्यायालय के समक्ष 10 साक्षियों के बयान कराए। साक्ष्यों और परिस्थितियों से सहमत होते हुए न्यायालय ने आरोपी को दोषी ठहराकर उक्त सजा सुनाई।

अदालत ने कहा—सहानुभूति का कोई आधार नहीं

न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि सौतेला पिता होते हुए ऐसा दुष्साहस करने वाले आरोपी के प्रति किसी भी प्रकार की सहानुभूति नहीं दिखाई जा सकती। बालकों के प्रति बढ़ते अपराध, उनकी असुरक्षा तथा ऐसे अपराधों का उनके वर्तमान और भविष्य पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए अपराध के स्वरूप के अनुरूप शिक्षाप्रद दंड देना आवश्यक है।

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