“दाल में काला नहीं, पूरी दाल ही काली है!” हत्या के आरोपी कर्मचारी पर विभाग मेहरबान? विभागीय कार्रवाई और कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

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पुलिस के पत्र, न्यायालय में चालान और विभागीय रिकॉर्ड के बावजूद कार्रवाई स्पष्ट नहीं; कार्यपालन यंत्री पी.के. त्रिपाठी की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में

सीधी। महानहर (गुलाबसागर) परियोजना संभाग, सीधी में सामने आए दस्तावेजों ने जल संसाधन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हत्या के एक प्रकरण में आरोपी विभागीय कर्मचारी के संबंध में पुलिस द्वारा विभाग को आधिकारिक पत्र भेजे जाने, न्यायालय में चालान प्रस्तुत होने तथा विभागीय रिकॉर्ड उपलब्ध होने के बावजूद अब तक विभागीय कार्रवाई स्पष्ट नहीं होने से मामला चर्चा का विषय बना हुआ है।

उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, कोतवाली थाना सीधी ने हत्या सहित विभिन्न धाराओं में दर्ज प्रकरण के आरोपी कर्मचारी त्रिलोक प्रसाद साकेत के संबंध में मुख्य कार्यपालन यंत्री पी.के. त्रिपाठी को पत्र भेजकर नियमानुसार विभागीय कार्रवाई करने का अनुरोध किया था। इसके बावजूद यह प्रश्न उठ रहा है कि विभाग ने इस संबंध में अब तक क्या कार्रवाई की और उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया।

सबसे बड़ा सवाल—आखिर किसके आदेश से हुई ज्वाइनिंग?

यदि संबंधित कर्मचारी के विरुद्ध गंभीर आपराधिक मामला न्यायालय में विचाराधीन था, तो उसे दोबारा कार्यालय में कार्यभार ग्रहण कराने की अनुमति किस अधिकारी ने दी? क्या विभाग ने मध्यप्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियमों एवं सेवा नियमों का पालन किया, अथवा मामले की अनदेखी की गई?

इन बिंदुओं पर भी उठ रहे हैं सवाल

उपलब्ध दस्तावेजों और सामने आए तथ्यों के आधार पर कई अन्य मामलों को लेकर भी प्रश्न उठाए जा रहे हैं—

हत्या के आरोपी कर्मचारी पर विभागीय कार्रवाई हुई या नहीं?

सातवें वेतनमान का लाभ किन-किन स्थायी कर्मचारियों को और किस आदेश के तहत दिया गया?

कार्यपालन यंत्री के अधीन संचालित शासकीय वाहन MP-66-T-2791 एवं MP-53-ZE-4295 के संबंध में विज्ञप्ति किस तिथि और किस समाचार पत्र में प्रकाशित की गई?

जल संसाधन विभाग के पुराने जर्जर भवन में एसी लगाने की अनुमति किस सक्षम अधिकारी ने दी?

कर्मचारियों की वर्दी के बिलों में कथित अनियमितता के आरोपों की जांच हुई या नहीं?

जवाबदेही पर उठे सवाल

मामला अब केवल एक कर्मचारी तक सीमित नहीं रह गया है। यदि पुलिस ने विभाग को लिखित रूप से जानकारी दी थी, तो उसके बाद नियमों के अनुरूप क्या कार्रवाई की गई? यदि कार्रवाई हुई, तो उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं है? यदि नहीं हुई, तो इसकी जिम्मेदारी किस अधिकारी की होगी?

इन सवालों ने विभागीय पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर बहस छेड़ दी है। स्थानीय लोगों एवं कर्मचारियों के बीच पूरे मामले की उच्चस्तरीय, निष्पक्ष एवं समयबद्ध जांच की मांग तेज हो गई है। साथ ही, यदि जांच में नियमों की अनदेखी, प्रशासनिक लापरवाही या वित्तीय अनियमितता सामने आती है, तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई किए जाने की मांग भी उठ रही है।

नोट: यह समाचार उपलब्ध दस्तावेजों एवं सार्वजनिक रूप से उठाए गए प्रश्नों के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें वर्णित आरोपों एवं दावों का अंतिम सत्यापन तथा कानूनी निष्कर्ष संबंधित विभाग, जांच एजेंसियों एवं सक्षम न्यायालय की प्रक्रिया के अधीन हैं। किसी भी व्यक्ति की जिम्मेदारी या दोष का अंतिम निर्धारण विधिक प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद ही माना जाएगा।

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