जल,जंगल,जमीन के रक्षक व पोषक हैं आदिवासी: प्रीती पटेल

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प्राइड इंडिया न्यूज़ सीधी से शाहिद खान 6264877120

घनघोर बारिश के बीच मना विश्व आदिवासी दिवस! कार्यक्रम में पहुंची पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल की धर्मपत्नी प्रीती पटेल

सीधी: ज़िले के ग्राम सलैहा में आज विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर हमारी संस्कृति हमारी पहचान को अक्षुण्ण रखने वाले जल,जंगल,जमीन के रक्षक व पोषक आदिवासी भाइयों एवं बहनों के साथ विश्व आदिवासी दिवस पर गोंडी आदिवासी समाज द्वारा आयोजित कार्यक्रम में पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल की धर्मपत्नी श्रीमती प्रीती पटेल ने शामिल होकर अपने बिंध्य सहित पूरे देश और मध्य प्रदेश के आदिवासी भाई बहनों को विश्व आदिवासी दिवस की बधाई और शुभकामनाएं दीं | अपने उद्बोधन में उन्होंने पर्यावरण के प्रति सचेत रहने व कटते जंगलों सिमटते आदिवासी भाई बहनो के प्रति चिंता जाहिर की | उन्होंने कहा कि पूरे देश में मध्य प्रदेश एक ऐसा राज्य है जहां सर्वाधिक जंगल बचे हुए थे किंतु अब वह भी संकट में हैं | आदिवासी भाई बहनों को स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने एवं नशे की प्रवृत्ति छोड़ शिक्षा की ओर कदम बढ़ाने की जरुरत है |

इस अवसर पर आदिवासी भाई बहनों द्वारा अनेकों सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति दी गई जिमसे
समृद्ध आदिवासी संस्कृति जीवन दर्शन को समर्पित कार्यक्रम में पारंपरिक लोकगीत एवं नृत्य तथा वाद्य यंत्र की धुन पर मंत्र मुक्त हुए दर्शक इस अवसर पर सीधी विधानसभा के कांग्रेस प्रत्याशी रहे ज्ञान सिंह सहित अनेकों कार्यकर्ता एवं सैकड़ो आदिवासी भाई बहन घनघोर बारिश के बीच पंडाल के अंदर मौजूद रहे |

भारत ही नहीं, दुनिया के तमाम देशों में आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैं, जिनका रहन-सहन, खानपान, रीति-रिवाज सबकुछ आम लोगों से अलग होता है। समाज की मुख्‍यधारा से कटे होने के कारण आदिवासी समाज आज भी पिछड़े हुए हैं। यही वजह है कि भारत समेत तमाम देशों में इनके उत्‍थान के लिए, इन्‍हें बढ़ावा देने और इनके अधिकारों की ओर ध्‍यान आकर्षित करने के लिए आज यानी 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है। बता दें कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पहली बार 1994 को अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी वर्ष घोषित किया था।

जानिए इनसे जुड़ा रोचक इतिहास

आदिवासी समुदाय के लोगों की भाषाएं, संस्‍कृति, त्‍योहार, रीति-रिवाज और पहनावा सबकुछ अन्य समाज के लोगों से अलग होता है। यही वजह है कि ये लोग समाज की मुख्‍यधारा से नहीं जुड़ पाए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक इनकी संख्‍या आज भी समय के साथ घटती जा रही है। आज भी आदिवासी समाज के लोगों को अपना अस्तित्व, संस्कृति और सम्मान बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। इसकी एक मुख्य वजह ये है कि ये लोग प्रकृति से समीप रहना ज्यादा पसंद करते हैं और जंगलों में रहते हैं जिसकी वजह से ये मुख्यधारा से कटे रहते हैं। आज जंगल घटते जा रहे हैं जिसकी वजह से इनकी संख्या भी कम होती जा रही है।

भारत में आदिवासी समुदाय की है बड़ी तादाद
भारत के मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्‍तीसगढ़, बिहार आदि तमाम राज्‍यों में आदिवासी समुदाय के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं। मध्‍य प्रदेश की बात कहें तो यहां 46 आदिवासी जनजातियां रहती हैं, जिसमें एमपी की कुल जनसंख्या के 21 फीसदी लोग आदिवासी समुदाय के हैं। वहीं झारखंड की कुल आबादी का करीब 28 फीसदी आदिवासी समाज के लोग हैं।

सिर्फ मध्‍य प्रदेश में गोंड, भील और ओरोन, कोरकू, सहरिया और बैगा जनजाति के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं। बता दें कि गोंड एशिया का सबसे बड़ा आदिवासी समूह है, जिनकी संख्या 30 लाख से अधिक है। मध्य प्रदेश के अलावा गोंड जनजाति के लोग महाराष्ट्र, बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश में भी रहते हैं। वहीं में संथाल, बंजारा, बिहोर, चेरो, गोंड, हो, खोंड, लोहरा, माई पहरिया, मुंडा, ओरांव आदि आदिवासी समाज के लोग भारत के विभिन्न राज्यों में रहते हैं।

प्राइड कदम हिंदी समाचार एवं प्राइड इंडिया न्यूज़ सीधी (मध्य प्रदेश)

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