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भारत का संविधान – एक जीता हुआ दस्तावेज

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भारत का संविधान – एक जीता हुआ दस्तावेज

प्राइड इंडिया न्यूज़ हर सच जो आप जानना चाहें

न्याय के लिए किसी आंदोलन और समानता के लिए गीत और कविता की तमाम प्रेरणाओं के पीछे जो एक भाव होता है, वह मनुष्य की समानता का ही होता है | आप यह जानते ही हैं कि भारत का संविधान हम सभी को समान मानता है | देश में समता के लिए चलने वाले आंदोलन और संघर्ष अक्सर संविधान के आधार पर ही समता और न्याय की बात करते हैं | तवा मत्स्य संघ के मछुआरों की आशा का आधार भी संविधान के प्रावधान ही रहे होंगे | अपनी बातचीत में लगातार संविधान का जिक्र करने से वे उसे एक ऐसे जीते हुए दस्तावेज की तरह उपयोग कर रहे हैं, जो हमारे जीवन में सचमुच अर्थ रखता हो | लोकतंत्र में कई व्यक्ति और समुदाय लगातार इस दिशा में कोशिश करते हैं कि, लोकतंत्र का दायरा बढ़ता जाए और अधिक से अधिक मामलों में समानता लाने की जरूरत को स्वीकार किया जाए |

समता का मूल्य लोकतंत्र के केंद्र में है | इस घटना में हमने ऐसे कुछ मुद्दों को देखने का प्रयास किया है जो लोकतंत्र के मूल भाव के लिए चुनौती पैदा करते हैं | जैसा कि आपने पढ़ा होगा देश की स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकारण, संचार के माध्यमों (मीडिया) पर व्यवसायिक घरानों का बढ़ता दबाव और नियंत्रण, महिलाओं के श्रम को कम मूल्य देना और कपास के किसानों की बेहद कम आय होना ये सब लोकतंत्र के लिए चुनौतियां ही तो हैं | ये वे मुद्दे हैं जो सीधे गरीबों को प्रभावित करते हैं और समाज में उपेक्षित समुदायों से जुड़े हुए हैं | ये देश में सामाजिक और आर्थिक समानता से जुड़े मुद्दे हैं |

लोकतंत्र के लिए समता और उसके लिए संघर्ष एक महत्वपूर्ण तत्व है | व्यक्ति और समुदाय का स्वाभिमान और गरिमा तब बनी रह सकती है जब उसके पास अपनी और परिवार की सभी जरूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन हों और उसके साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाए |

प्राइड कदम हिंदी समाचार एवं प्राइड इंडिया न्यूज़ सीधी (मध्य प्रदेश) संवाददाता शाहिद खान

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