वोट तो दलितों का भी नहीं ट्रांसफर हुआ, ठीकरा सिर्फ यादव वोटरों पर ही क्यों

बसपा संस्थापक कांशीराम पर किताब लिखने वाले बद्रीनारायण ने कहा, मायावती की वो राजनीतिक ताकत खत्म होती नजर आ रही है जिसके जरिए वो दलित वोट ट्रांसफर करवा लेती थीं
बीजेपी से लेकर समाजवादी पार्टी तक…आखिर मायावती की पार्टी बसपा क्यों राजनीतिक रिश्ते नहीं निभा पाती? क्या लोकसभा चुनाव में गठबंधन की हार का ठीकरा सिर्फ यादव वोटरों पर ही फोड़ना चाहिए? या फिर इसके लिए वो वोटबैंक भी जिम्मेदार है, मायावतीखुद को जिसका सबसे बड़ा लीडर बताती हैं? राजनीतिक विश्लेषक एवं समाजशास्त्री बद्री नारायण का कहना है कि बसपा प्रमुख राजनीति को सिर्फ गणित की तरह देखती हैं. गणित नहीं हल हुआ तो संबंध तोड़ लिया. लेकिन राजनीति सिर्फ गणित नहीं होती. उसके अलावा भी कुछ होती है. यह बीजेपी से सीखना चाहिए. राजनीति में परिणाम के लिए इंतजार करना पड़ता है.
बसपा के संस्थापक कांशीराम की जीवनी ‘कांशीराम: द लीडर ऑफ द दलित्स’ लिखने वाले बद्रीनारायण कहते हैं कि यदि गठबंधन की हार के लिए यादव वोटर जिम्मेदार हैं तो दलित वोटर भी हैं. कहीं यादव वोट मायावती को ट्रांसफर नहीं हुआ तो कहीं दलित वोट अखिलेश यादव को नहीं मिला. दोनों वोटबैंक एक दूसरे को ट्रांसफर होते तो ऐसी नौबत नहीं आती. इसलिए यह सवाल तो मायावती से भी पूछा जाना चाहिए कि वो गठबंधन को दलित वोट क्यों नहीं ट्रांसफर करवा पाईं. दलित वोट ट्रांसफर नहीं हुआ है तो क्या इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए?
मायावती ने गठबंधन की हार का ठीकरा यादव वोटबैंक पर फोड़ा!
बद्रीनारायण का कहना है कि बसपा को तो फिर भी सम्मानजनक सीटें मिल गईं. इसमें सबसे ज्यादा घाटे में तो अखिलेश यादव हैं. जिनकी इतनी कोशिश के बाद भी समाजवादी पार्टी सिर्फ पांच सीट पर सिमट गई. मायावती की सबसे बड़ी ताकत ये थी कि वो अपना दलित वोटबैंक कहीं भी ट्रांसफर करवा लेती थीं, अगर 2019 के चुनाव में यह वोटबैंक ट्रांसफर नहीं हुआ है तो यह मान लेना चाहिए कि वोट ट्रांसफर करवाने की उनकी ताकत खत्म हो गई है.
बीजेपी ने यादव ही नहीं दलित वोटरों में भी लगाई सेंध
बीजेपी ने न सिर्फ यादव वोटबैंक में सेंध लगा ली है बल्कि उसने दलित वोटरों को भी अपने पक्ष में कर लिया है. आम धारणा है कि दलित बीजेपी को वोट नहीं करते, लेकिन 2014 की मोदी लहर में राष्ट्रीय स्तर पर दलितों का सबसे ज्यादा वोट बीजेपी को ही मिला था. कुल दलित वोट का करीब 24 फीसदी. कांग्रेस को 2014 में 18.5 फीसदी दलित वोट से संतोष करना पड़ा था. अपने आपको दलितों की सबसे बड़ी नेता बताने वाली मायावती की पार्टी बीएसपी को महज 13.9 दलितों ने वोट किया था. ये आंकड़े सीएसडीएस के हैं.
कब तक चलेगा सपा-बसपा गठबंधन?
रिजर्व सीटों पर इसलिए है बीजेपी का दबदबा
लोकसभा की 131 सीट रिजर्व हैं. 84 अनुसूचित जाति और 47 अनुसूचित जनजाति के लिए. दलित बहुल इन सीटों पर कभी कांग्रेस अपना एकाधिकार समझती थी तो कभी बसपा एवं अन्य क्षेत्रीय पार्टियां. लेकिन 2019 की मोदी लहर में पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले दस अधिक 77 सुरक्षित सीटों पर बीजेपी के प्रत्याशी जीत गए. सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्स के निदेशक प्रोफेसर एके वर्मा कहते हैं, “बीजेपी में दलितों ने अपनी जगह बना ली है. जहां तक मायावती की बात है तो उनसे जाटव तो खुश है लेकिन गैर जाटव दलित संतुष्ट नहीं हैं.”
जाटव, गैर जाटव दोनों पर बीजेपी का दांव
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बीजेपी को ज्यादातर गैर जाटव दलितों का समर्थन मिला है. लेकिन अब बीजेपी जाटवों में भी पैठ बनाने की कोशिश में जुट गई है. इसी रणनीति के तहत उसने पहले मेरठ की रहने वाली कांता कर्दम को राज्यसभा भेजा और अब आगरा की रहने वाली बेबीरानी मौर्य को उत्तराखंड का राज्यपाल बना दिया. खास बात ये है कि महिला होने के साथ-साथ दोनों जाटव बिरादरी से आती हैं. मायावती भी जाटव बिरादरी से हैं.
बीजेपी ने यादव और दलित दोनों वोटबैंक में लगाई सेंध!
समाजशास्त्री बद्रीनारायण लिखते हैं कि आरएसएस ने पिछले 25-30 साल से गैर जाटव दलितों के बीच काम किया है. यूपी में 66 दलित जातियां हैं. इनमें चार-पांच जातियों को तो बहुजन राजनीति और सरकारों में प्रतिनिधित्व मिला लेकिन शेष जातियां छूटी रहीं. इन छूटी जातियों में बीजेपी और आरएसएस ने ढंग से काम किया. जैसे इन जातियों का सम्मेलन आयोजित करना, इनके हीरो तलाशना, उनकी पहचान को उभारना. ये सब करते हुए भी बीजेपी ने इन्हें हिंदुत्व के फ्रेम में ही रखा.
ऐसे में जब यादव और दलित दोनों वोटबैंक हमें दरकते नजर आ रहे हैं तो फिर गठबंधन में अकेले सपा को जिम्मेदार ठहराना ठीक नहीं.