मजेदार बात…माटी के दीया ने क्या दिया ? दीया ने जलने और जलाने वाले को पनाह दिया
दीया के जलने और आदमी के जलने में क्या अंतर है ?

प्रतिदिन शाम को घरों में दीया जलाने की पऱपरा प्राचीन काल से है । हर शुभ कार्य में भी दीया जलाया जाता हैं। और साल में सब लोग दीया जलाकर दीपावली मनाते हैं। जिसे प्रकाश पर्व कहा जाता है।
इस संदर्भ में किसी से यह पूछ कर देखिए कि आप जो दीया जलाते हो उस दीया ने क्या दिया ? इसका सीधा उत्तर मिलेगा दीया ने उजाला दिया, प्रकाश दिया ।
लेकिन माटी का दीया बड़े विनम्रतापूर्वक कहता है कि मैंने उजाला नहीं किया, प्रकाश नहीं दिया। यदि मैं जलता तो लोग इतने हिम्मत से नहीं कह पाते कि दीया तले अंधेरा है । यह उपहास मैं युगों से सहन कर रहा हूं।आज इस भ्रम से पर्दा उठाना जरूरी है।
दीया ने आगे कहा – मैंने जो नहीं दिया, उसे लोगों ने कहा दीया ने दिया, लेकिन मैंने जो दिया उसे लोगों ने जानने का प्रयास नहीं किया । इस रोचक और मजेदार बात को मेरे अंदर घटने वाली घटनाओं से समझा रहा हूं ।
जब दुनिया में बिजली का आविष्कार नहीं हुआ था, तब दीया का महत्व आज से ज्यादा था। लेकिन दीया के अंदर रहने वाले तेल और बाती में विवाद हो गया कि माटी के दीया का महत्व मेरे कारण बढ़ा।
यह छोटी सी बात दोनों के बीच प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया। देखते ही देखते तेल और बाती में वाक युद्ध ठन गया। आप खुद सोचकर देखिए कि तेल और बाती में कौन बढ़ा है ? किसका महत्व अधिक है ? इस विवाद को कविता के माध्यम से समझिए।
बढ़ गया विवाद, बातों बातों के खेल में।
कौन किससे है बढ़ा, बाती और तेल में।।
सबसे पहले बाती ने अपना पक्ष रखते हुए कहा –
बाती पहले डोला, फिर अकड़ कर बोला।
मैं जलता हूं, अंधेरा हरता हूं, उजाला करता हूं।
इसलिए बाती बढ़ा है तेल से ।
तेल बाती की इन बातों को सुनकर जल-भुन गया । देखिए उनकी आंतरिक दशा –
बाती की बेतुकी बातों को, तेल ने मन में तौला।
प्रतिष्ठा की आंच में, अंदर ही अंदर खौला।।
फिर खिसियानी बिल्ली सी,
तुनक मिजाज में बोला।
मुझे मालूम है तुम जलते हो,
अंधेरा हरते हो, उजाला करते हो।
पर किसी और से नहीं,
तुम सिर्फ मुझसे जलते हो।
मित्रों, यहां पर तेल और बाती अपनी – अपनी ज़िद में अडे़ हुए हैं कि हम किसी से कम नहीं। फिर बहुत देर के बाद इस मामले पर फैसला देने का अधिकार माटी के दीया को दिया।
दीया ने दोनों पक्षों के बयान को ध्यान से सुनकर सुंदर फैसला दिया – मैं जो भी कहूंगा सच कहूंगा, सच के अलावा कुछ न कहूंगा ।
सच यह है कि तुम दोनों, एक दूसरे से जलते हो ।
पर अपने स्वार्थ हित नहीं, परमार्थ हित जलते हो ।।
दीया ने तेल और बाती के मन मुटाव को मिटाकर कहा – तुम दोनों की तरह आदमी भी आदमी से जलते रहता है, लेकिन तुम्हारे जलने और आदमी के जलने में बहुत अंतर है। वो स्वार्थ हित जलते हैं, तुम परमार्थ हित जलते हो।
पर यह बात हमेशा याद रखना कि तुम दोनों एक साथ रहकर दुनिया को जो रौशनी दे पा रहे हो,वह अलग अलग रहकर नहीं दे पाओगे। इसलिए कौन बड़ा ? कौन छोटा ? को भूलकर अपना कर्तव्य निभाओ, यही स्व धर्म है।
अंत में माटी के दीया ने कहा – दुनिया भले ही कहे कि दीया जलता है, पर हकीकत में मैं जलता नहीं हूं । लेकिन यह बात बिल्कुल सच है कि मैं जलने वाले और जलाने वाले दोनों को अपने दिल में पनाह देता हूं । इसलिए लोग प्रेम से कहते हैं – दीप जलाके दीवाली हम मनाएंगे ।
राम आएंगे आएंगे राम आएंगे ।।
यही है आशीर्वाद का दीया ।
डा. मुन्नालाल देवदास
( राष्ट्रपति एवं राज्यपाल पुरस्कृत )
से नि प्रधान पाठक, नवाचारी शिक्षाविद
नगर पंचायत कोपरा जिला गरियाबंद छ ग