जनता का पैसा, पंचायत की ऐश!

पांढुरना की पंचायतों में ‘टैक्स’ की लूट: विकास कागजों पर, भ्रष्टाचार धरातल पर
पांढुरना (निलेश कलसकर जिला ब्युरो चिफ)
पांढुरना | जनपद पंचायत पांढुरना के ग्रामीण क्षेत्रों में इन दिनों एक अजीबोगरीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है। एक तरफ ग्राम पंचायतों के पास फिजूलखर्ची और बिना काम के खर्चों के लिए फंड की कोई कमी नहीं है, वहीं दूसरी ओर जब क्षेत्र के किसी गांव को ‘आदर्श मॉडल ग्राम’ बनाने की बात आती है, तो पंचायतें कंगाली का रोना रोने लगती हैं। हैरानी की बात यह है कि समूचे पांढुरना क्षेत्र में एक भी ऐसी पंचायत नहीं है जिसे गर्व से ‘आदर्श’ कहा जा सके; जो भी दावे हैं, वे सिर्फ सरकारी फाइलों में कैद हैं।
आम आदमी की गाढ़ी कमाई पर डाका
यह समझना बेहद जरूरी है कि पंचायतों के पास जो करोड़ों का फंड पहुंचता है, वह सरकार का अपना पैसा नहीं है। यह क्षेत्र की जनता द्वारा चुकाए गए टैक्स (Tax) का वह पैसा है जो एक-एक रुपया जोड़कर सरकारी खजाने में जमा होता है। सरकार यह राशि पंचायतों को इसलिए भेजती है ताकि गांवों का कायाकल्प हो सके, लेकिन पांढुरना की कड़वी सच्चाई यह है कि विकास कार्य केवल आधे-अधूरे होते हैं। भ्रष्टाचार का आलम यह है कि अधिकारी और पंचायत प्रतिनिधि मिलकर बंदरबांट करते हैं और जनता का हक मार दिया जाता है।
मोक्षधाम को ‘मातृ-पितृ वन’ बनाने की मांग पर प्रशासन का ठंडा जवाब
पिछले सप्ताह क्षेत्र के जागरूक नागरिकों ने जिला कलेक्टर पांढुरना को एक ज्ञापन सौंपकर एक बेहद नेक पहल की मांग की थी। मांग थी कि— “हर ग्राम पंचायत के मोक्षधाम (श्मशान घाट) को ‘मातृ-पितृ वन’ के रूप में विकसित किया जाए।” इसे सर्वसुविधायुक्त, हरा-भरा और पर्यावरण के अनुकूल बनाने का प्रस्ताव था ताकि पूर्वजों की स्मृति को संजोया जा सके। लेकिन प्रशासन का जवाब बेहद निराशाजनक रहा। “बात चल रही है” और “फंड नहीं है” जैसे रटे-रटाए जवाब देकर इस जनहितकारी मांग को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
“जब भ्रष्टाचार के लिए करोड़ों का फंड उपलब्ध है, तो फिर एक सार्थक और पवित्र कार्य के लिए खजाना खाली कैसे हो जाता है? यह जनता के साथ सरासर धोखा है।
क्षेत्र के आक्रोशित नागरिक
आदर्श ग्राम की हकीकत: केवल कागजी घोड़े
पांढुरना क्षेत्र की पंचायतों में यदि कोई निर्माण कार्य शुरू भी होता है, तो वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़कर अधूरा ही दम तोड़ देता है। गुणवत्ता के नाम पर खानापूर्ति की जाती है ताकि अगली बार फिर उसी काम के लिए बजट पास कराया जा सके। आज क्षेत्र की जनता यह पूछ रही है कि उनके द्वारा दिए गए टैक्स का हिसाब कौन देगा? क्या पांढुरना की पंचायतें कभी भ्रष्टाचार के चंगुल से आजाद होकर सही मायने में ‘आदर्श’ बन पाएंगी?
मुख्य बिंदु जो जनता जानना चाहती है:
फंड का रहस्य: फिजूलखर्ची के लिए बजट कहाँ से आता है और जनहित के लिए क्यों खत्म हो जाता है?
अधूरे कार्य: क्षेत्र की सड़कों, नालियों और सामुदायिक भवनों की बदहाली का जिम्मेदार कौन?
टैक्स का दुरुपयोग: क्या जनता की गाढ़ी कमाई सिर्फ पंचायत प्रतिनिधियों की जेब भरने के लिए है?