ग्राम पंचायत सारंगपुर पड़रिया में सरपंच एवं सचिव के द्वारा खेली जा रही रहा है,भ्रष्टाचार की होली!
कागजों में विकास की गाथा—मैदान में कार्य शून्य!

रिपोर्टर आशुतोष पाण्डे
डिंडौरी— आदिवासी बहुल जिला डिंडौरी की ग्राम पंचायत सारंगपुर पड़रिया एक बार फिर चर्चाओं में है। कारण है पंचायत स्तर पर संचालित योजनाओं में पारदर्शिता को लेकर उठते गंभीर सवाल। शासन द्वारा आम जनता को विकास कार्यों की जानकारी देने और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से शुरू किए गए पंचायत दर्पण पोर्टल की स्थिति यहां जमीनी हकीकत से मेल खाती नजर नहीं आ रही है। कागजों और पोर्टल पर जहां विकास कार्यों की लंबी सूची और लाखों रुपये के भुगतान दर्ज हैं, वहीं गांव में इन कार्यों का वास्तविक स्वरूप या तो दिखाई नहीं देता या फिर नाममात्र का है।
पारदर्शिता की मंशा, लेकिन अमल कमजोर
शासन की मंशा स्पष्ट है कि पंचायत से लेकर जिला स्तर तक होने वाले सभी विकास कार्यों की जानकारी सार्वजनिक हो, ताकि आम नागरिक भी देख सके कि उसके गांव में किस योजना के तहत कितना खर्च हुआ। इसी उद्देश्य से पंचायत दर्पण पोर्टल को लागू किया गया, जहां निर्माण कार्य, सामग्री खरीदी, मजदूरी भुगतान और अन्य खर्चों का विवरण अपलोड करना अनिवार्य है। लेकिन सारंगपुर पड़रिया पंचायत में यह व्यवस्था केवल औपचारिकता बनकर रह गई है।
स्थानीय ग्रामीणों और जानकारों का आरोप है कि पंचायत दर्पण पर जो दस्तावेज अपलोड किए जा रहे हैं, वे पारदर्शिता के बजाय संदेह को जन्म देते हैं। कई बिल इतने धुंधले और अपठनीय हैं कि उनमें सामग्री का नाम, फर्म का विवरण, बिल क्रमांक, दिनांक, हस्ताक्षर और राशि तक स्पष्ट नहीं है।
अपठनीय और संदिग्ध बिलों की भरमार
सूत्रों के अनुसार पंचायत दर्पण पोर्टल पर अपलोड किए गए कई बिल अधूरे और संदिग्ध प्रतीत होते हैं। कुछ बिलों में न तो फर्म का नाम स्पष्ट है और न ही यह पता चलता है कि किस कार्य के लिए सामग्री खरीदी गई। कई मामलों में केवल राशि दिखाई देती है, लेकिन काम का विवरण नदारद है। जानकारों का कहना है कि ऐसे बिल केवल खानापूर्ति के लिए अपलोड किए जाते हैं, ताकि भुगतान की प्रक्रिया को वैध दिखाया जा सके।
ग्रामीणों का आरोप है कि इन अपठनीय बिलों के आधार पर लाखों रुपये का भुगतान दर्शाया गया है, जबकि जमीनी स्तर पर न तो उतना काम हुआ और न ही सामग्री गांव तक पहुंची।
जमीनी सच्चाई: काम कम, खर्च ज्यादा
गांव के लोगों का कहना है कि पंचायत दर्पण में जिन विकास कार्यों का उल्लेख किया गया है, उनमें से कई कार्यों का गांव में कोई अता-पता नहीं है। कहीं निर्माण कार्य अधूरा है, तो कहीं घटिया गुणवत्ता की सामग्री का उपयोग किया गया है। कुछ स्थानों पर तो कार्य शुरू होने से पहले ही भुगतान कर दिए जाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि आज भी गांव में सड़क, नाली, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं है। इसके बावजूद कागजों में लाखों रुपये के विकास कार्य पूरे दिखाए जा रहे हैं, जो कई सवाल खड़े करता है।
एक ही पंचायत में लंबे समय से पदस्थ सचिव
नियमों के अनुसार किसी पंचायत सचिव का लंबे समय तक एक ही पंचायत में पदस्थ रहना उचित नहीं माना जाता, क्योंकि इससे प्रशासनिक पारदर्शिता प्रभावित हो सकती है। लेकिन सारंगपुर पड़रिया पंचायत में सचिव वर्षों से लगातार पदस्थ बताए जा रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि लंबे समय से एक ही स्थान पर बने रहने के कारण पंचायत की अधिकांश प्रक्रियाओं पर उनका एकछत्र नियंत्रण हो गया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब शिकायतें की जाती हैं, तो उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है, जिससे संदेह और गहरा होता जा रहा है।
पंचायत दर्पण पर उठते सवाल
जिस पंचायत दर्पण पोर्टल को पारदर्शिता का माध्यम बनाया गया था, वही यहां कथित तौर पर अनियमितताओं को छिपाने का साधन बनता दिख रहा है। अपूर्ण और अस्पष्ट दस्तावेज अपलोड कर यह दर्शाया जा रहा है कि सभी प्रक्रियाएं नियमों के तहत पूरी की जा रही हैं, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि बिल और दस्तावेज साफ, स्पष्ट और पढ़ने योग्य हों, तो आम नागरिक भी आसानी से यह समझ सकता है कि किस योजना में कितना खर्च हुआ और उसका लाभ किसे मिला।
उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग
सारंगपुर पड़रिया के ग्रामीणों ने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। पंचायत दर्पण पर दर्ज सभी कार्यों का भौतिक सत्यापन कराया जाए और कागजों में दिखाए गए खर्च की तुलना जमीनी हकीकत से की जाए। यदि ऐसा किया गया, तो कई बड़े घोटालों के उजागर होने की संभावना जताई जा रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो शासन की पारदर्शिता की मंशा पर सवाल उठते रहेंगे और विकास केवल फाइलों तक सीमित होकर रह जाएगा।
प्रशासन की भूमिका पर टिकी निगाहें
सारंगपुर पड़रिया पंचायत का यह मामला यह दर्शाता है कि केवल ऑनलाइन पोर्टल और नियम बना देने से पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं होती। जब तक निगरानी और जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे मामलों पर रोक लगाना मुश्किल है। अब सभी की निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं कि वह इस मामले में क्या ठोस कदम उठाता है—निष्पक्ष जांच और कार्रवाई, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह कागजों में ही दबकर रह जाएगा।