भारत का अन्नदाता: गरीबी के अंधेरे में एक डूबता तारा 

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संवाददाता- निलेश कलसकर जिला ब्युरो चिफ जिला पांढुरना

 

पांढुरना/ देश के हर कोने में आज एक चीख़ गूँज रही है—वह चीख़ है भारत के अन्नदाता, हमारे किसान की! एक तरफ़, भारत ‘विश्वगुरु’ और ‘5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था’ के नारों से चमक रहा है, लेकिन दूसरी तरफ़, इस झूठी चमक के नीचे, गाँव-गाँव में कर्ज़, लाचारी, और भुखमरी की भयानक सच्चाई दबी हुई है।

जो किसान अपनी रीढ़ की हड्डी तोड़कर, ख़ून-पसीना बहाकर पूरे देश का पेट भरता है, वह आज ख़ुद भूखा सोने को मजबूर है। आँकड़े चीख़-चीख़कर गवाही दे रहे हैं: शीर्ष 1% आबादी 40.1% राष्ट्रीय संपत्ति की मालकिन है, जबकि देश की आधी आबादी, जिसमें ये लाखों किसान और मज़दूर शामिल हैं, मिलकर भी सिर्फ़ 6.5% संपत्ति पर गुज़ारा कर रहे हैं! यह असमानता नहीं, यह तो हमारे किसान के गले पर कसा हुआ फ़ाँसी का फंदा है!

अंबानी और अडानी की दौलत हर सेकंड आसमान छू रही है, और ठीक उसी क्षण, देश का किसान-पुत्र अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए साहूकार के आगे गिड़गिड़ाने पर मजबूर है! उसकी मेहनत का सही दाम—न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)—आज तक एक मज़ाक बना हुआ है। किसान को न तो बीज खरीदने के लिए पूंजी मिलती है, न फ़सल खराब होने पर बीमा, और न ही अपनी उपज का बाज़ार में उचित मूल्य।

यह त्रासदी किसी प्राकृतिक आपदा का नतीजा नहीं है। यह तो क्रूर, पूँजीवादी नीतियों का परिणाम है। यह कॉरपोरेट टैक्स में कटौती, मज़दूर-विरोधी लेबर कोड, और देश की सार्वजनिक संपत्ति को पूँजीपतियों के हाथों लूटने की खुली छूट का परिणाम है।

जब तक हम इस लूटतंत्र को ‘विकास’ का नाम देते रहेंगे, तब तक किसान की हालत नहीं सुधरेगी। जब तक देश का 1% अभिजात्य वर्ग हमारे किसान के पसीने पर ऐश करता रहेगा, तब तक यह विषमता बढ़ती रहेगी।

याद रखिए: अगर किसान की झोपड़ी में अंधेरा है, तो यह देश भी कभी सच्ची रोशनी नहीं देख पाएगा। समय आ गया है कि इस चुप्पी को तोड़कर किसान के लिए न्याय की माँग की जाए!

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