जन्माष्टमी पर मनाई आल्हाखंड के महानायक ऊदल की जयंती 

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ऊदल जयंती पर फिर उठी महोबा में उनका संग्रहालय बनाने की मांग

 

महोबा। अपनी वीरता से 11वीं-12वीं शताब्दी में चंदेल राजवंश की यश कीर्ति शिखर पर पहुंचाने वाले वीर ऊदल की जयंती कृष्ण जन्माष्टमी पर आज श्रद्धा और गौरव के साथ मनाई गई। बुंदेलों ने सुबह बारिश के बीच ऊदल चौक स्थित उनके स्मारक पर जाकर अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए और उनकी वीर गाथाओं का बखान किया। साथ ही प्रशासन से वीरभूमि में एक ऐसा संग्रहालय बनाने की मांग की जिसमें आल्हा-ऊदल के जन्म से लेकर मृत्यु तक का सचित्र वर्णन एक साथ उपलब्ध हो।

बुंदेली समाज के संयोजक तारा पाटकर बुंदेलखंडी ने बताया कि वीर ऊदल का जन्म महोबा से 10 किलोमीटर दूर दिसरापुर गांव में चंदेल नरेश परमाल के सेनापति दक्षराज व माता देवला के आंगन में जन्माष्टमी को हुआ था जबकि उनके भाई वीर आल्हा का जन्म ज्येष्ठ दशहरा को उसी गांव में हुआ था लेकिन दुर्भाग्यवश ऊदल जब गर्भ में थे, मांडवगढ़ के राजा करिया ने उनके पिता दक्षराज व चाचा बक्षराज की हत्या कर दी। इस दुखद घटना से आहत माता देवला ने ऊदल के जन्म पर खुशियां नहीं मनाई और कहा कि ऊदल का आगमन परिवार के लिए अशुभ है। बाद में राजा परमाल ने आल्हा ऊदल को पाला। सबसे पहले आल्हा ऊदल ने शक्तिशाली मांडवगढ़ के राजा जम्बे व उनके बेटे करिया को धूल चटाई और पिता की मौत का बदला लिया। फिर दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान को हराया। उन्होंने 52 लड़ाइयां जीतकर चंदेल साम्राज्य को दूर-दूर तक फैलाया लेकिन आज संरक्षण के अभाव में आल्हा ऊदल की सभी निशानियां धीरे-धीरे मिट रही हैं।

महामंत्री डा. अजय बरसैंया ने कहा कि ऊदल की शादी नरवरगढ़ की राजकुमारी फुलवा से हुई और 1182 में कीरत सागर के तट पर पृथ्वीराज चौहान की सेना पर विजय ने आल्हा ऊदल की वीरता के किस्से जन-जन तक पहुंचा दिये। कजली महोत्सव में महोबा की सड़कों पर उनका विजय जुलूस निकलता है। महाकवि जगनिक ने आल्हा खंड रचकर उनको अमर बना दिया। बाद में ऊदल बैरागढ़ में पृथ्वीराज से लड़ने हुई ऊदल वीरगति को प्राप्त हुए। इस मौके पर अवधेश, पवन गुप्ता, गया प्रसाद, प्रेम चौरसिया, मनप्रीत सिंह अरोड़ा, प्रमोद शुक्ला, अच्छे लाल, महेन्द्र, दीपू, मुन्ना व रवि सोनी समेत तमाम लोग मौजूद रहे।

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