सीधी,जिलापंचायत :बहरूपियों की बहार, योजनाओं पर प्रहार, फाइलों की रफ्तार तेज, जमीनी विकास फैल —आखिर जिम्मेदार कौन?विकास भवन या ‘विकास’ का वनवास?

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सीधी जिले का विकास भवन इन दिनों किसी प्रशासनिक केंद्र से ज्यादा एक राजनीतिक रंगमंच जैसा नजर आ रहा है। किरदार बदलते हैं, पद बदलते हैं, आदेश बदलते हैं—लेकिन कहानी वही रहती है। विकास के दावे ऊंचे, मगर जमीनी सच्चाई सवालों के घेरे में।

 

कागजों में योजनाओं की चमक है, बैठकों में प्रगति का प्रतिशत है, लेकिन गांव के अंतिम छोर पर बैठा व्यक्ति अब भी पूछ रहा है—“मुझे क्या मिला?”

 

जल मूलक योजना या ‘जाल’ मूलक रणनीति?

 

जिले में जल जीवन, नल-जल और अन्य जल आधारित योजनाओं को लेकर जो चर्चाएँ हैं, वे विकास से ज्यादा व्यवस्था के “प्रबंधन कौशल” की ओर इशारा करती हैं।

आरोप यह हैं कि तकनीकी स्वीकृतियों से लेकर भुगतान तक की प्रक्रिया में पारदर्शिता से ज्यादा “संबंधों की मजबूती” काम करती है।

 

योजनाएँ स्वीकृत हुईं, राशि जारी हुई, कार्य पूर्णता प्रमाण पत्र भी लगे—पर कई स्थानों पर धरातल पर काम अधूरा या निम्न गुणवत्ता का बताया जा रहा है।

सवाल यह नहीं कि फाइल चली या नहीं, सवाल यह है कि पानी नल से निकला या नहीं।

 

पीआरडी पोर्टल से वाहन शाखा तक—कुर्सियों का खेल

 

जिला पंचायत के संवेदनशील विभाग—पीआरडी पोर्टल, स्थापना शाखा, भंडार, वाहन शाखा—इन सबके संचालन को लेकर भी चर्चाएँ गर्म हैं।

अनुभव और योग्यता की जगह “विश्वासपात्रता” यदि चयन का मापदंड बन जाए, तो परिणाम भी उसी अनुपात में निकलते हैं।

 

फाइलों की दिशा, आदेशों की गति और स्वीकृतियों का संतुलन—यदि पारदर्शी न हो, तो विकास का पहिया लड़खड़ाना तय है।

आरोप यह भी हैं कि कुछ कुर्सियाँ ‘स्थायी प्रभाव’ में हैं, जबकि अधिकारी बदलते रहते हैं।

 

डब्ल्यूआरडी प्रकरण: तकनीकी स्वीकृति या तकनीकी चूक?

 

डब्ल्यूआरडी से जुड़े करोड़ों के कार्यों को लेकर भी लंबे समय तक सवाल उठते रहे।

तकनीकी और प्रशासनिक स्वीकृतियाँ जारी हुईं, भुगतान भी हुआ—लेकिन बाद में अधिकार क्षेत्र पर ही प्रश्न खड़े हो गए।

 

जांच एजेंसियों ने दस्तक दी, फाइलें खुलीं, बयान दर्ज हुए—पर कथित बिचौलियों की सक्रियता पर विराम लगा या नहीं, यह अब भी बहस का विषय है।

आधे खेल के बाद नियमों की याद आना, प्रशासनिक सतर्कता से ज्यादा विडंबना का उदाहरण बन गया।

 

18 करोड़ परफॉर्मेंस ग्रांट: गाइडलाइन बनाम ‘रचनात्मक व्याख्या’

 

करीब 18 करोड़ रुपये के परफॉर्मेंस ग्रांट फंड को लेकर भी सवाल उठे।

जहाँ सीमित तकनीकी स्वीकृति अपेक्षित थी और पूर्व निधि शेष बताई जा रही थी, वहीं आदेश की ऐसी व्याख्या हुई कि पूरी राशि उपयोग की प्रक्रिया में आ गई।

 

गाइडलाइन का पालन हुआ या नहीं—इस पर आधिकारिक बयान और आरोपों के बीच स्पष्टता कम दिखी।

जवाबों की फाइलें मोटी हैं, मगर जवाब कितने ठोस हैं—यह जनता तय करना चाहती है।

 

फेलोशिप छात्र से ‘अस्थायी अफसर’ तक

 

एक और दिलचस्प अध्याय—एक फेलोशिप छात्र, जिनकी भूमिका रिपोर्टिंग और डेटा संकलन तक सीमित थी, उन्हें अचानक महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रभार सौंपे गए।

युवा प्रतिभा को अवसर देना सकारात्मक कदम है, पर अनुभवी अधिकारियों की जिम्मेदारी अनुभवहीन कंधों पर डालना प्रयोग था या मजबूरी?

 

जब मीडिया में सवाल उठे, तो चुपचाप व्यवस्था में बदलाव कर दिया गया।

यह बदलाव सुधार था या विवाद प्रबंधन—यह भी चर्चा का विषय बना।

 

विकास का विमर्श बनाम जमीनी सच्चाई

 

जिला पंचायत ग्रामीण विकास की धुरी है—सड़क, पानी, स्वच्छता, आजीविका, आवास सबकी कमान यहीं से चलती है।

लेकिन यदि प्राथमिकता जनहित से ज्यादा पद-संतुलन हो जाए, तो योजनाएँ कागजों में पूरी और धरातल पर अधूरी रह जाती हैं।

 

बैठकें नियमित होती हैं, समीक्षा रिपोर्ट प्रस्तुत होती हैं, प्रतिशत बढ़ते हैं—पर जमीनी असंतोष भी साथ बढ़ता दिख रहा है।

 

❓ जनता का सवाल: जवाबदेही किसकी?

 

लोकतंत्र में आलोचना दुश्मनी नहीं, सुधार का माध्यम होती है।

यदि आरोप निराधार हैं तो पारदर्शिता से खंडन होना चाहिए।

यदि त्रुटि है तो स्वीकार कर सुधार होना चाहिए।

लेकिन सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब सवाल पूछना ही असुविधाजनक माना जाने लगे।

 

सीधी की जनता यह जानना चाहती है—

 

योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक कब पहुँचेगा?

 

स्वीकृत राशि का वास्तविक उपयोग कैसे सुनिश्चित होगा?

 

कुर्सियाँ योग्यता से भरेंगी या योग्यता कुर्सियों की प्रतीक्षा करेगी?

 

अंतिम टिप्पणी: व्यंग्य में छिपी गंभीरता

 

यह रिपोर्ट आरोपों का निर्णय नहीं, बल्कि व्यवस्था पर उठते सवालों का आईना है।

जिला पंचायत जैसी संस्थाएँ केवल प्रशासनिक ढांचा नहीं—ग्रामीण भविष्य की आधारशिला हैं।

 

यदि विकास भवन सचमुच विकास का प्रतीक बनना चाहता है, तो उसे पारदर्शिता, जवाबदेही और जनहित को प्राथमिकता देनी होगी।

वरना इतिहास दर्ज करेगा—बैठकें हुईं, फाइलें चलीं, राशि स्वीकृत हुई…

 

पर विकास रास्ता भटक गया।

 

और तब सीधी फिर पूछेगा—

“विकास भवन में विकास कब आएगा?”

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