पूर्ण बहुमत… फिर भी अधूरी हुकूमत? सवालों के मौसम में घिरी व्यवस्था
29 की 29 सीटें, मजबूत जनादेश—फिर भी बिजली, पानी, सड़क, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य पर उठ रहे सवालथ

प्राइड कदम हिंदी समाचार / प्राइड इंडिया न्यूज़ सीधी (मध्यप्रदेश)
रिपोर्ट: शाहिद खान
सीधी।
प्रदेश में लंबे समय से सत्तारूढ़ सरकार और लोकसभा में 29 की 29 सीटों के पूर्ण समर्थन के बावजूद अब ग्रामीण और अर्धशहरी इलाकों में बुनियादी सुविधाओं को लेकर असंतोष उभरने लगा है। जनता का कहना है कि विकास के दावे और ज़मीनी हकीकत के बीच अंतर साफ दिखाई देता है।
⚡ बिजली: बढ़ता बिल, अनियमित आपूर्ति
ग्रामीण किसानों का आरोप है कि सीमित आय के बावजूद उन्हें औसतन 1000 से 1200 रुपये प्रतिमाह तक बिजली बिल का भुगतान करना पड़ रहा है। खेती की लागत पहले से बढ़ी हुई है, ऐसे में बिजली बिल अतिरिक्त बोझ बन रहा है। कई गांवों में बिजली कटौती और अनियमित आपूर्ति की शिकायतें भी सामने आती रहती हैं।
💧 पानी: टंकी है, पाइपलाइन है… पर पानी नहीं
नल-जल योजना के तहत कई गांवों में टंकियां और पाइपलाइन तो स्थापित कर दी गईं, लेकिन नियमित जल आपूर्ति नहीं हो पा रही। ग्रामीणों का कहना है कि गर्मी के मौसम में स्थिति और गंभीर हो जाती है। कई स्थानों पर पानी की टंकी शोपीस बनकर रह गई है।
🛣️ सड़क: गड्ढों में तब्दील मार्ग
गांवों और कस्बों की सड़कों की हालत भी चिंता का विषय है। कई प्रमुख मार्ग गड्ढों में तब्दील हो चुके हैं। अतिक्रमण के कारण रास्ते संकरे हो गए हैं, जिससे आवागमन प्रभावित हो रहा है। बरसात में हालात और बदतर हो जाते हैं।
🎓 शिक्षा: शिक्षकों की कमी
ग्रामीण क्षेत्रों के कई स्कूलों में नियमित शिक्षकों के पद रिक्त हैं। अतिथि शिक्षकों के भरोसे पढ़ाई संचालित हो रही है। महाविद्यालयों में भी संविदा व्यवस्था के सहारे शिक्षण कार्य चल रहा है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं।
🏥 स्वास्थ्य: संसाधनों का अभाव
स्वास्थ्य केंद्रों में दवाओं और डॉक्टरों की कमी आम शिकायत है। कई जगह प्राथमिक सुविधाओं के लिए भी मरीजों को जिला मुख्यालय का रुख करना पड़ता है।
💼 रोजगार और प्रशासनिक स्थिति
युवाओं में बेरोज़गारी को लेकर चिंता बनी हुई है। राजस्व विभाग, जनपद और पंचायत स्तर पर कई पद रिक्त बताए जाते हैं, जिससे प्रशासनिक कार्यों की गति प्रभावित हो रही है। निचले स्तर के कर्मचारियों पर अतिरिक्त भार देखा जा रहा है।
स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोप भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
❓ जनता का सवाल
जब पूर्ण बहुमत और मजबूत जनादेश मिला है, तो फिर बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष क्यों?
गांवों में चर्चा आम है कि घोषणाएं और योजनाएं तो बनती हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन और निगरानी क्यों नहीं हो पा रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि व्यापक जनादेश के साथ अपेक्षाएं भी बड़ी होती हैं।
मऊगंज और आसपास के क्षेत्रों में एक व्यंग्य पंक्ति भी दोहराई जा रही है—
“चपरासी बैठ अधिकारी कुर्सी, शासन तंत्र चलावत है…”
यह पंक्ति व्यवस्था पर सवाल के रूप में देखी जा रही है।
लोकतंत्र में जनादेश केवल सत्ता नहीं देता, बल्कि जवाबदेही भी तय करता है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि प्रशासन और सरकार इन बुनियादी समस्याओं के समाधान के लिए क्या ठोस और प्रभावी कदम उठाते हैं।
जनता विकास के दावों से आगे बढ़कर ज़मीनी बदलाव देखना चाहती है—और फिलहाल सवालों का मौसम जारी है।