पांढुरना: मोक्षधामों को ‘मातृ-पितृ वन’ बनाने की अभिनव पहल, कलेक्टर को सौंपा गया विस्तृत खाका

हरित तीर्थ स्थल के रूप में विकसित होंगे ग्राम पंचायतों के मोक्षधाम; पूर्वजों के नाम पर वृक्षारोपण अनिवार्य करने का सुझाव।
संवाददाता – निलेश कलसकर जिला ब्युरो चिफ जिला पांढुरना
पांढुरना – पांढुरना जिले की ग्रामीण पंचायतों में एक महत्वपूर्ण और पर्यावरण-केंद्रित बदलाव की नींव रखी गई है। स्थानीय नागरिक निलेश कलसकर (ग्राम पंचायत भंदारगोंदी) ने कलेक्टर महोदय को एक विस्तृत आवेदन सौंपा है, जिसमें क्षेत्र के सभी मोक्षधामों को ‘मातृ-पितृ वन’ के रूप में विकसित करने का आग्रह किया गया है। इस योजना का लक्ष्य इन पवित्र स्थलों को केवल अंतिम संस्कार की जगह न रखकर, उन्हें श्रद्धा, हरियाली और शांति का केंद्र बनाना है।
योजना का भावनात्मक और पर्यावरणीय आधार
आवेदन में स्पष्ट किया गया है कि मोक्षधाम क्षेत्र अत्यंत भावनात्मक महत्व रखते हैं, जिन्हें ग्राम पंचायत के सहयोग से एक रमणीय स्थल में बदला जा सकता है। इसका मुख्य आधार ‘अनिवार्य वृक्षारोपण’ है।
प्रमुख प्रस्तावित बिंदु:
पूर्वज स्मृति पौधरोपण: मृतक के परिवारजनों को प्रेरित किया जाएगा कि वे अपने दिवंगत पूर्वजों की स्मृति में मोक्षधाम में अनिवार्य रूप से एक छायादार या फलदार पौधा रोपित करें। यह पौधा पहचान पट्टिका के साथ लगाया जाएगा, जिससे परिवार का भावनात्मक जुड़ाव बना रहे और वे उसकी देखभाल करें।
सुरक्षा एवं संरचना: मोक्षधाम क्षेत्र की सुरक्षा हेतु तारबंदी (फेंसिंग) करना अनिवार्य होगा। साथ ही, वर्षा से बचाव के लिए एक छोटी प्रतीक्षालय शेड और आगंतुकों के लिए बैठने की उचित व्यवस्था (बेंच) की जाएगी।
वित्तीय प्रबंधन एवं निरंतरता: इस योजना की सफलता सुनिश्चित करने के लिए, रखरखाव और पानी की व्यवस्था हेतु मनरेगा (MNREGA) अथवा 15वें वित्त आयोग की निधि से आवश्यक फंड का प्रावधान करने का सुझाव दिया गया है।
सामुदायिक भागीदारी: प्रत्येक ग्राम स्तर पर ‘मातृ-पितृ वन रखरखाव समिति’ का गठन करने और वर्ष में कम से कम दो बार सामुदायिक श्रमदान आयोजित करने पर जोर दिया गया है, ताकि वनों की निरंतर साफ-सफाई और देखरेख सुनिश्चित हो सके।
आवेदक श्री कलसकर ने कलेक्टर महोदय से यह सुनिश्चित करने का अनुरोध किया है कि संबंधित ग्राम पंचायतों द्वारा इस जन-कल्याणकारी कार्य को समय-सीमा के भीतर, केवल कागजी खानापूर्ति से ऊपर उठकर, पूरी निष्ठा के साथ मौके पर क्रियान्वित किया जाए। प्रशासन द्वारा इस पहल पर विचार करने से जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में एक सकारात्मक, पर्यावरणीय और सामाजिक बदलाव आने की उम्मीद है।