श्रद्धा की प्रतिमूर्ति महावीर प्रसाद सिंह ‘माधव’।

कुमार भास्कर
बेतिया,उगते होनहार वीरवान के होत चिकने पात ,,सवेरे होते ही सूर्य को देखकर दिन का अनुमान होता उपरोक्त उक्तियाँ स्वर्गीय चाचा महावीर पर सटीक प्रमाणित होती है। शायद इसलिए इनका नाम महावीर रखा गया लगा। ये वास्तव में महावीर हैं। जिस काम की कल्पना की, खाका बनाया और सफलता प्राप्न कर ही दम लेते रहे हैं। पिछे मुड़कर कभी देखा नहीं कि इनके पिछे कितने लोग साथ देने वाले हैं। इनके कार्य को देखकर बुढे और जवान तक जुड़े सभी साथ देते हुए इनका मनोबल बढ़ते रहे हैं। पटना जिला (वर्तमान नालन्दा किला) के भूवापुर मृटाचक) में लकड़ाया में श्री भरत बानू प्रथमं तारापुर थाना के हरपुर गाँव के पोखर पर लाकर रुके थे। संभवत इनके जान पहचान का कोई परिवार था। वहाँ से नित्य सवरे
आकर, जहाँ वर्तमान घर है आते एवं विपावान जगल को काटकर एक स्थान चुनकर झोपड़ीनुमा बनाकर रहने लगे। पुन जंगल को काटकर जीतने के लिए जमीन बना जौत आबाद कर रहने लगे। इनके तीन संतान में लालती, बुलाकी एवं मीता। लालजी में दाह, दाह से हर हरपू से जयमंगाल और जयमंगल के द्वितीय पुत्र के रूप में महावीर का अवतरण 19/3/23 को ग्राम पो. पं. माझगाँय वाया सकेनी खड़गपुर (मुंगेर में हुआ। श्री महावीर प्रसाद सिंह माधव क्तित्व और वागर्थ इनकी प्राधिक शिक्षा ग्रामीण परिवेश में निम्न प्राथमिक पाठशाला कुबड़ा महानां के उस समय के भदष गुरू जी की देख-रेख में हुई थी। उस समय इस इलाके में शिक्षा का घोर अभाव था। इनके पास 3-4 टोले के छात्र पढ़ने आते थे। प्रथम वेगी उत्तीर्ण कर बनहारा मिडिल स्कूल में चतुर्थ वर्ग में नामांकन कराये। उस समय भारत क्या दुनिया के अधिकांश देशों पर अंग्रेजों का आधिपत्य था। कहा जाता था कि अवेजों के राज में सूरज नहीं डूबता है। पानि पदि भारत के सूर्य आदि में उसके दूसरे राज्य यथा-अमेरिका प्रात हो जाता था। अंग्रेजों के कठोर शासन से भारतीय जनता अन्त थी। सन् 1857 में आजादी की लड़ाई लड़ी गई थी जिसे दबा दिया गया। पर स्वतंत्रता की चिंगारी शान्त नहीं हुई थी. सुलग रही थी। भारतीय जनता आजादी के लिए उत्पटा रही थी। उस समय कांग्रेस ही एकमात्र पार्टी थी जो सम्पूर्ण भारत में आजादी का मंत्र फैला रही थी। नाम 8 अगस्त 1942 को गाँधी के ‘करो या मरों के आह्वान पर सम्पूर्ण देश में क्रान्ति की लहर फैल गई। भड़े-बड़े नेता जेल में बंद कर दिये गये। छूटने में नेहा के कथों पर अगस्त क्रांति का बोझ पड़ा। अब क्या था-जेल डाक सहक
को अवरुद्ध किया जाने लगा। इनके चाचा बंधु बाबू 1930 ई० के स्वतंत्रता आन्दोलन की आग में कूदे हुए से जो घर आने पर सारी कहानी कहते थे। जिसका प्रभाव माधय जी पर पड़ा। Worthy of the worthy father और आप स्कूल छोड़ आन्दोलन में कुद गये। जगपुर में दक्षिण मुलुक टाँड में एक जगलनुमा स्थान था जिससका नाम ‘पंचवदन स्थान था। क्रांतिकारियों का छिपने का अड्डा श्री महावीर प्रसाद सिंह माधव व्यक्तित्व और नार्थ बना। वहीं से रात दिन में भी पम्पलेट गांव खड़गपुर बाजार, हाट में ले जाते एवं सांटते थे। काली पर पीकेटिंग आज का भाना करत कालक्रम में आंदोलन समाप्त हुआ और आप पुनः पढ़ने लगे। मिडिल पास कर हम्कूल में दाखिला लिए। भारत आजाद हो गया। स्वतंत्रता की लहर में पुनः आंग्रेजी शिक्षा को लात मारकर राष्ट्रीय विद्यालय में प्रष्ट हु राम धरसद मिह साधक जी की देख-रेख में विशारद एवं साहित्यालंकार किये। पुनः शिक्षक की ट्रेनिंग कर शिक्षक बने और आयु सीमा के अनुस्वार सेवानिवृत हो साहित्य साधना में स्वतंत्र रूप से तत्पर हो गये। मालती चाची 1996 में स्वर्ग स्रिधार गयी। इनकी दर्जनों पुस्तके प्रकाशित हो चुकी है। दर्जनों प्रेस में एवं पचासों पाण्डुलिपियाँ घरे में है। अपनी संतानों को शिक्षित करने में लगे रहे। सबसे बड़े डा. जय प्रकाश सिंह द्वितीय विष्णुदेव सिंह, कनिष्ठ राजीव रंजन सुधांशु है। एक पुत्री आशा देनी है। ईश्वर इन्हें दीपांधु बनाये यही मेरी प्रार्थना है ताकि देश, समान एवं साहित्य साधना करते रहें।