जुऐं के नीचे गर्दन डाल, लिया बिछा बर्बादी का जाल

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सीधी-(राकेश शर्मा) कौन कहता है कि आतंकियों का धर्म नहीं होता। पहलगाम में धर्म पूंछ पूंछ कर ही तो बेगुनाहों का सीना छलनी किया गया। भारत ने देश के दुश्मन को बहुत समझाया, बहुत चेताया, पर जरा भी होश ना आया! उम्मीद में बहुत समय भी गंवाया, फिर भी सही मार्ग नहीं अपनाया! सहनशीलता की भी हद होती है सीमा होती है और जब उस सीमा का अतिक्रमण होने लगता है, पानी सर से ऊपर जाने लगता है तब सब्र रूपी बांध को ना चाहते हुए भी मजबूर होकर टूट जाना पड़ता है। और जब यह सब्र रूपी बांध टूटता है तब बहाव इतना तीव्र होता है कि वीरान और खंडहर करता हुआ अपनी अमिट छाप छोंड़ जाता है। देश की आत्मा पर जब किसी नीच, निर्लज्ज द्वारा कायराना बार किया जाता है तब अंतरात्मा की आवाज यही होती है कि पानी और खून भला एक साथ कैसे बह सकते हैं।

अनाचारियों द्वारा पहलगाम में खूनी खेल खेलने के बाद देश की नसों में दौड़ने वाला खून हिसाब चुकता करने के लिए बेहिचक उबाल मारता हुआ नजर आ रहा है। भारत द्वारा बहुत सारे निहायत कदम उठा लिए गए हैं जिससे दुश्मन की नींद हराम हो गई है। शारीरिक और मानसिक युद्ध में से मानसिक युद्ध शुरू हो चुका है जो दुश्मन को भिखारी बना देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। और जब शारीरिक युद्ध की शुरुआत होगी तब परिणाम वास्तव में कल्पना से परे ही होगा। अभी जो खामोशी है वह वह संकेत करती है कि आने वाले कुछ ही समय में दुश्मन को खाक में मिला देने वाली है। दुश्मन ने जानबूझकर जुयें के नीचे गर्दन डाल दिया है और अपनी बर्बादी का जाल बिछा लिया है।

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